हिंदी भाषी भाजपा कार्यकर्ता की कथित हत्या के मामले में नामजद आरोपी को टिकट देने से उत्तर भारतीय मतदाताओं में आक्रोश
कल्याण-डोंबिवली।
कल्याण डोंबिवली महानगरपालिका चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी के एक फैसले ने हिंदी भाषी बहुल क्षेत्र में तीखा असंतोष पैदा कर दिया है। भाजपा ने प्रभाग क्रमांक 17 ‘क’ से मोरेश्वर भोईर को एक बार फिर उम्मीदवार बनाया है। यह वही क्षेत्र है, जहां 50 प्रतिशत से अधिक मतदाता हिंदी भाषी हैं और इसी निर्णय को लेकर उत्तर भारतीय समाज में उग्र रोष देखा जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस व्यक्ति पर भाजपा के ही उत्तर भारतीय कार्यकर्ताओं की हत्या का गंभीर आरोप है, उसे दोबारा टिकट देना उनके घावों पर नमक छिड़कने जैसा है। यह नाराज़गी इतनी गहरी है कि इसका असर भाजपा के साथ-साथ शिवसेना (शिंदे गुट) के इस प्रभाग के सभी चार उम्मीदवारों पर पड़ सकता है।
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क्या है पूरा मामला
वर्ष 2008 में कल्याण के पिसवली गांव में एक सनसनीखेज घटना सामने आई थी। उस समय महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) से जुड़े कार्यकर्ताओं पर आरोप लगा था कि उन्होंने भाजपा उत्तर भारतीय आघाड़ी के जिला उपाध्यक्ष जयप्रकाश दुबे के घर में घुसकर दो डॉक्टर भाइयों की हत्या कर दी थी।
इस मामले में तत्कालीन मनसे कल्याण तालुका प्रमुख मोरेश्वर भोईर को मुख्य आरोपी बताया गया था। यह मामला आज भी कल्याण न्यायालय में लंबित है और अभी तक इसका अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
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उत्तर भारतीय बहुल क्षेत्र में क्यों बढ़ा गुस्सा
प्रभाग क्रमांक 17 ‘क’ में चेतना, पिसवली, अरवली, टाटा पावर हाउस, गोलवली और दाउडी रोड के कुछ हिस्से आते हैं। यह पूरा इलाका उत्तर भारतीय, विशेषकर हिंदी भाषी मतदाताओं का गढ़ माना जाता है।
इसके बावजूद भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) ने यहां से किसी भी उत्तर भारतीय उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। उलटे, मनसे पृष्ठभूमि से आए और उत्तर भारतीय कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोपी बताए जा रहे व्यक्ति को उम्मीदवार बनाकर स्थानीय समाज की भावनाओं को आहत किया गया है—ऐसा आरोप स्थानीय लोग लगा रहे हैं।
राजनीतिक नुकसान की आशंका
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला भाजपा के लिए भारी पड़ सकता है। जिस क्षेत्र में हिंदी भाषी मतदाता निर्णायक भूमिका में हों, वहां इस तरह की उम्मीदवारी चुनावी गणित बिगाड़ सकती है। नाराज़ मतदाता या तो मतदान से दूरी बना सकते हैं या विरोध में मतदान कर सकते हैं।
सवालों के घेरे में भाजपा की रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा की चुनावी रणनीति और उत्तर भारतीय समाज के प्रति उसके रुख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी की ओर से अब तक इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर असंतोष खुलकर दिखाई दे रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि भाजपा इस रोष को शांत करने के लिए कोई कदम उठाती है या फिर यह नाराज़गी चुनाव परिणामों में तब्दील होती है।

