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हिंदीभाषी ‘वोट बैंक’ या सिर्फ ‘मोहरा’? कल्याण-डोंबिवली में भाजपा के ‘अज्ञात’ आत्मविश्वास का सच!

कल्याण-डोंबिवली:

आगामी 15 जनवरी को होने वाले मनपा चुनावों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो गई है। हर दल अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक समीकरण, जातीय गणित और क्षेत्रीय प्रभाव को तौल रहा है।

लेकिन कल्याण-डोंबिवली में भारतीय जनता पार्टी की रणनीति ने सबको चौंका दिया है। भाजपा यहां किसी “जनसंख्या आधार” पर नहीं, बल्कि एक ऐसी “अज्ञात शक्ति” के भरोसे चुनावी मैदान में है, जिसने स्थानीय समीकरणों को हाशिए पर धकेल दिया है।

वर्चस्व हिंदीभाषियों का, पर प्रतिनिधित्व शून्य क्यों?

कल्याण पूर्व, कल्याण पश्चिम और डोंबिवली ग्रामीण के कई प्रभाग ऐसे हैं जहाँ हिंदीभाषी मतदाता ‘किंगमेकर’ की भूमिका में हैं। यदि ये मतदाता एकजुट होकर किसी एक पक्ष में मतदान कर दें, तो परिणाम पलटने की क्षमता रखते हैं। विडंबना देखिए, जिन प्रभागों में हिंदीभाषियों का डंका बजता है, वहां भाजपा की संभावित उम्मीदवारों की सूची से हिंदीभाषी चेहरे गायब हैं।

सवाल यह है: क्या भाजपा ने यह मान लिया है कि हिंदीभाषी मतदाता उनकी “बपौती” हैं? क्या पार्टी को यह लगता है कि बिना प्रतिनिधित्व दिए भी हिंदीभाषी मतदाता ‘झक मारकर’ कमल के बटन पर ही उंगली दबाएंगे?

कौन है वह ‘जयचंद’ जो कर रहा है सौदेबाजी?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि भाजपा नेतृत्व को यह “अंधविश्वास” दिलाने वाला आखिर है कौन? कल्याण भाजपा के भीतर ऐसे कौन से ‘जयचंद’ हिंदीभाषी सक्रिय हैं, जो अपने ही समाज के प्रतिनिधित्व की बलि चढ़ाकर नेतृत्व को यह आश्वासन दे रहे हैं कि “हिंदीभाषी कहीं नहीं जाएगा”?

बिना किसी ठोस प्रतिनिधित्व के, क्या यह मान लेना कि एक पूरा समुदाय एकमुश्त मतदान करेगा, मतदाताओं का अपमान नहीं है? आखिर किस आधार पर इन हिंदीभाषी नेताओं ने पार्टी आलाकमान को यह भरोसा दिलाया है कि उन्हें टिकट न देकर भी उनका समर्थन हासिल किया जा सकता है?

रणनीति या रणनीतिक चूक?

भाजपा की यह “व्यू रचना” पिछले तीन-चार सालों से तैयार बताई जा रही है। लेकिन इस रचना में उस जनता को ही जगह नहीं मिली, जो जीत की असली बुनियाद है। स्थानीय कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर भारी रोष है कि पार्टी स्थानीय जनसंख्या और जनभावनाओं को नजरअंदाज कर “अदृश्य शक्ति” के भ्रम में जी रही है।