सभी के वादे – सभी के इरादे नेक हैं, फिर जनता क्यों उदास है भाई ?
(कर्ण हिन्दुस्तानी )
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में जिस तरह से सभी पार्टियां प्रचार कर रहीं हैं वह देखने लायक है। सत्ताधारी दल अपने किये कामों का ढोल पीट रहा है तो विपक्ष इस ढोल की पोल खोलने में लगा है। इन दोनों के बीच जनता की आवाज सुनने वाला शायद कोई नहीं है। जनता से कोई नहीं पूछ रहा है कि वह क्या चाहती है ? जनता को सभी दलों से क्या उम्मीद है ? जनता का मन जान्ने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है।
सभी दलों के नेतागण भी अपनी चुनावी सभा में भीड़ जमाने के लिए कार्यकर्ताओं और इवेंट मैनेजमेंट को खुल कर धन मुहैय्या करवा रहे हैं। हजारों लाखों की भीड़ जमाकर अपनी ताक़त दिखाने वाले राजनितिक दलों को भी पता है कि तालियां पीटने वाली भीड़ उनकी मतदाता नहीं है। फिर भी भाषण ठोकना नेताओं का पेशा है और वह यह काम बखूबी कर भी रहे हैं।
जनता की नब्ज पकड़ कर काम करने वाले राजनीतिक दल आज नदारद हो गए हैं। चौपाल लगाकर जनता से संवाद करने वाले जनसेवक तो तलाशने पर भी नहीं मिलेंगे। रास्तों की दुरव्यवस्था , पेयजल की समस्या , सार्वजनिक वाहन प्रणाली की समस्या , सिग्नल व्यवस्था का चौपट होना , ट्रेनों और बसों में भीड़ बकरी की तरह ठूसकर जाने वाली जनता की आवाज सुनता कौन है ?
जनता भी दिन भर के काम से थक कर घर आने पर, घर में उमीदवार की तरफ से भेजे गए हैंडबिल को देखता है और मुस्कुराकर चुप हो जाता है। क्योंकि उसे पता है कि हैंड बिल के अनुसार यदि काम किया गया होता तो जनता को राहत मिल जाती। दस रूपये में भोजन देने के बजाए एक रूपये की झुनका – भाखर योजना को पुनर्जीवित किया गया होता तो बेहतर होता। मगर ऐसा नहीं है। एक रूपये में जनता की बीमारी की जांच की जाएगी। जांच के बाद बीमारी के इलाज पर होने वाले खर्च को वाहन करने की जिम्मेदारी जनता को ही उठानी होगी।
फिर चाहे वह जनता शहरी हो या ग्रामीण। ऐसे में क्या सिर्फ बीमारी बताने के नाम पर एक – एक रुपया कर सरकारी तिजोरी में लाखों करोड़ों रूपये जमा किये जाएंगे ? किसानों के कर्ज माफ़ करने की वही पुरानी घोषणा को दोहराया गया है। लेकिन किसानों का कौन सा कर्ज माफ़ होगा यह कोई भी राजनीतिक दल क्यों नहीं बताता ? बैंकों से लिया गया कर्ज माफ़ होगा या फिर साहूकारों से लिया गया भारी – भरकम कर्जा भी सरकार ही माफ़ करेगी। जनता की हालत यह है कि गाँव में खाने को नहीं और शर में कमाने को नहीं। ऐसे में चुनावी वादों का कोई क्या करे ? यह यक्ष प्रश्न है।

