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बीजेपी का वैचारिक एजेंडा हुआ पूरा, लाल किले से लेकर आधिकारिक प्रोटोकॉल तक ‘वंदे मातरम’ को मिला सर्वोच्च स्थान

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वैचारिक एजेंडे में ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समकक्ष दर्जा दिलाना हमेशा से एक प्रमुख प्राथमिक बिंदु रहा है। लाल किले की प्राचीर से 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रगान से ठीक पहले राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का गायन इस लंबे सांस्कृतिक व राजनीतिक अभियान की औपचारिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में इस ऐतिहासिक बदलाव को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि आजादी के बाद यह पहला मौका है जब लाल किले पर आधिकारिक समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम’ बजाया गया।

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क्रमबद्ध रणनीति और कानूनी आधार

यह बदलाव रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि एक सोची-समझी नीति के तहत लागू किया गया है। सरकार ने हाल ही में कानून में संशोधन कर ‘वंदे मातरम’ के पूर्ण संस्करण को राष्ट्रगान के समान ही कानूनी संरक्षण और संवैधानिक सम्मान प्रदान किया है।
इससे पहले, आधिकारिक प्रोटोकॉल के तहत ‘जन गण मन’ को ही गणतंत्र का सर्वोच्च संगीतमय प्रतीक माना जाता था और इसे राजकीय व सरकारी समारोहों में बजाया जाता था। वहीं ‘वंदे मातरम’ मुख्य रूप से सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों तक सीमित था।

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सांस्कृतिक प्रतीक को राष्ट्रीय मुख्यधारा में स्थापित करने का प्रयास

‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर रक्षा मंत्रालय द्वारा दिए गए इस विशेष सम्मान को भाजपा के वैचारिक संकल्पों की सिद्धि के रूप में विश्लेषित किया जा रहा है।

आधिकारिक प्रोटोकॉल का विस्तार: 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्र के नाम संबोधन के प्रारंभ और समापन पर भी इसे बजाया गया, जो नए प्रोटोकॉल के नियमित इस्तेमाल को दर्शाता है।

वैचारिक एजेंडे की पूर्णता: ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान के बराबर दर्जा दिलाकर संघ परिवार के दीर्घकालिक राजनीतिक और सांस्कृतिक एजेंडे को अंततः सफलता मिल गई है।

स्वतंत्रता संग्राम के इस ऐतिहासिक गीत को अब राजकीय कार्यक्रमों में राष्ट्रगान के समकक्ष स्थान मिलना भारतीय राजनीति और प्रशासनिक प्रोटोकॉल में एक बड़े बदलाव का संकेत है।