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उत्तरभारतीय महापंचायत को विवादों में रहकर नाम कमाने की पुरानी आदत

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे को उत्तरभारतीय महापंचायत नामक संस्था ने अपने मंच पर बुला कर क्या हासिल कर लिया ये समझ के परे है.आज की लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रो में बड़े बड़े हेडिंग में छापा है की उत्तर भारतीयों के मंच से ही राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों को चेताया, उन्हें बताया की आप का स्वाभिमान कहा है.आप क्यों महाराष्ट्र में चले आते हो.आप अपने राज्य के नेताओं से रोजगार के लिए पूछो.कथित तौर पर उत्तर भारतीयों के लिए कार्यरत उत्तरभारतीय महापंचायत नामक संस्था द्वारा उत्तर भारतीयों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने वाले इस आयोजन का प्रयोजन समझ से परे लगा.

मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने अपने भाषण में रेलवे परीक्षा में मनसे कार्यकर्ताओ द्वारा उत्तर भारतीयों से मारपीट की बहुत चतुराई से सफाई दी, टेक्सी वालो से क्यों मारपीट हुई क्यों उनकी टेक्सी तोड़ी गयी इस पर भी उन्होंने सफाई दिया.उन्होंने महाराष्ट्र में बढ़ रहे अपराधो के लिए भी उत्तर प्रदेश बिहार के लोगो को ही जिम्मेदार ठहराया,भाषा और प्रान्तवाद की लड़ाई पूरी दुनिया में होने की भी बात कही,मनसे प्रमुख ने सभा में उपस्थित लोगो को कहा (चेताया) की मै यहाँ आपलोगों को कोई सफाई देने नही आया बल्कि आपलोगों को समझाने आया हु की आप अपने गाव और राज्य के लोगो को समझाओ की वे अब महाराष्ट्र में नही आये.

उत्तरभारतीय महापंचायत नामक संस्था पिछले तीन चार साल से कथित तौर पर उत्तर भारतीयों के लिए समाज में सक्रिय है सोशल मिडिया खासकर व्हाट्सअप,और फेसबुक पर,अनेने सामजिक कार्यो को पोस्ट करने के साथ इस संस्था के पदाधिकारियों को विवादों में पर कर नामचीन बनने का पुराना शौक है,पिछले दिनों ही महापचायत के पदाधिकारी हिंदी भाषियों की महाराष्ट्र भर में सबसे बड़ी और सम्मनित संस्था उत्तर भारतीय संघ के विरुद्ध जमकर आवाज उठाई थी.

अब कल रविवार को महापंचायत द्वारा अपने मच पर मनसे प्रमुख ठाकरे को बुलाना,और मनसे प्रमुख द्वारा अपने मराठी वोट बैंक मजबूत करने के लिए उत्तर भारतीयों के मंच से उत्तर भारतीयों के स्वाभिमान को धिकारना, ये बताना की मनसे कार्यकर्ताओं ने जो उत्तर भारतीयों के साथ मारपीट की वो बिलकुल सही किया और ये भी चेताना की ये संघर्ष जारी रहेगा,और जगह उत्तर भारतीय महापंचायत का मंच हो, क्या यह उत्तरभारतीय महापंचायत के नेताओ के लिए शर्मनाक है की नही ये समझा जा सकता है

महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों में अनेक उदाहरण है,जिसमे अनेक बड़े उत्तर भारतीयों नेताओं को ऐसे ही अति महत्वाकांक्षी उत्तर भारतीयों नेताओं ने  कुर्सी से खीचा है इसमें मुंबई से भाजपा के विधायक रहे अभिराम सिंह हो या फिर कांग्रेसी कोटे से राज्य के गृहराज्य मंत्री रहे कृपाशंकर सिंह हो,सबको हिंदी भाषियों ने जमीन दिखाई.

अब उत्तर भारतीयों की महाराष्ट्र में अनुपस्थिति का नुक्सान सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है,१० वर्ष पहले तक नासिक का अंगूर पुरे विश्व में अपना विशेष स्थान रखता था.हर शहर में वर्ष भर बाजार में अंगूर उपलब्ध रहते थे.और अंगूर के बागानों में दिन रात हिंदी भाषी प्रदेशो के मजदूर बंधुआ मजदुर की तरह कार्यरत रहते थे.लेकिन वर्ष २००८-०९ के दंगो में सभी हिदी भाषी मजदूरों को मार मार कर नासिक से भगा दिया गया,अब बाजार से धीरे धीरे अंगूर लुप्त होते जा रहे है.इसकी कोई जिम्मेदारी नही लेगा.

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