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गणेशोत्सव और छठ पूजा मे समानता

छठ पूजा पर विशेष

(राजेश सिन्हा)

महाराष्ट्र में गणेश उत्सव का विशेष महत्व है और इसके विशेष महत्व और पवित्रता के कारण ही यह त्यौहार महाराष्ट्र के साथ देश के हर कोने में और अब विश्व भर में धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व हो गया है.

कुछ इसी तरह का महत्व बिहार और झारखंड से शुरू हुए छठ पूजा का भी है। बिहार और झारखंड से शुरू हुए इस पर्व का महत्व अब देश के हर राज्य के साथ विश्व भर में महापर्व छठ मनाए जाने का उदाहरण से देखा जा सकता है।

गणेश उत्सव की तरह छठ महापर्व भी हिंदू आस्था का प्रतीक है। और इसे मनाने वाले घर के लोग बेहद उत्साह के साथ अनेक कडे नियमों का पालन करते है। इसीलिए गणेशोत्सव और छठ पूजा दोनों त्योहारों में मनाए जाने वाले नियम और उद्देश्य मिलते जुलते है।

मुंबई आसपास में इन्हीं विषय पर अध्ययन कर एक विशेष रिपोर्ट तैयार की गई है। जो अपने पाठकों को प्रस्तुत कर रहा है।

विश्व भर में प्रसिद्ध महाराष्ट्र के गणेश उत्सव पर अब सिर्फ महाराष्ट्र के मराठी वासियों का ही एकाधिकार नहीं रह गया है। इसे अब धूमधाम से देश भर के हर भाषा भाषियों द्वारा अपने-अपने राज्यों में धूमधाम से मनाया जाने लगा हैं।

गणेश उत्सव का स्वरूप जो आज है उसमें देश के प्रमुख समाज सुधारक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की महत्वपूर्ण भूमिका है। तिलक के दिशा निर्देशों के तहत स्थानीय लोग गणेश उत्सव महाराष्ट्र में विभिन्न नियमों के साथ मनाते हैं। और उसका एक अलग महत्व है।

विश्व भर में गणेश उत्सव भाद्रपद चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है लेकिन जिन घरों में गणेश उत्सव होता है वहां उन घरों मे कुछ नियम बने हुए हैं जिनमें गणेश उत्सव मनाए जाने वाले घरों में एक माह पूर्व यानी सावन माह की शुरुआत से ही घरों में मांसाहार प्रतिबंधित हो जाता है।

यह लोकमान्य तिलक का ही योगदान है कि गणेशोत्सव के दौरान श्रावण मास मे महाराष्ट्र भर मे मांसाहार उपभोग का प्रतिशत घट जाता है। और बाजार मे हरी सःब्जी कि मांग बढ़ जाती है।

गणेशोत्सव के दौरान घरों में सिर्फ शाकाहारी भोजन ही बनता है। दिन नजदीक आने के साथ ही घरों के साफ सफाई के साथ रंगाई पुताई के साथ घर शुद्ध और स्वच्छ रखने की विभिन्न नियम पालन होने लगते हैं।

ठीक इसी तरह के नियम छठ पर्व मनाए जाने वाले घर में भी पाले जाते हैं जिन घरों में छठ पूजा होती है उन घरों में दशहरा के बाद से ही कडे नियमों के तहत मांसाहार पर पाबंदी लग जाती है घर के सदस्यों के लिए मांसाहार घर के बाहर भी वर्जित हो जाता है।

घर की साफ सफाई, रंगाई पुताई दिवाली के पहले स्वभाविक हो जाता है। छठ व्रतियों के घरों में दिवाली के बाद से ही प्याज-लहसुन डालकर सब्जी बनना बंद हो जाता है। जैसे श्रावण मास खत्म होने के साथ गणेशोत्सव वाले घरों मे कांदा लहसुन वर्जित हो जाता है।

विश्व प्रसिद्ध समाज सुधारक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में गणेश उत्सव के लिए जो रूपरेखा तैयार की थी उसमें गणेश उत्सव पर घरों के बाहर रंगोली चित्रण भगवान गणेश जी के उस घर मे विराजमान होने की पहचान है।

गणेशोत्सव वाले घर का हर सदस्य आसपास के लोगों के साथ अपने सभी परिचितों को और रिश्तेदारों को गणेश उत्सव में आने का निमंत्रण देते हैं। आधुनिकीकरण के कारण अब इन घरों में किए गए विद्युत लाइटिंग से भी पहचान हो जाती है।

ठीक यही उदाहरण  महापर्व छठ आयोजित होने वाले घरों में भी देखे जा सकते हैं । उत्तर भारत में खासकर शहरों मे रंगोली अब प्रचलित होने लगी है लेकिन विद्युत लाइटिंग गांव में छठ पूजा होने वाले घरों में अपने आप पहचान बता देती है।

छठ पूजा में सभी रिश्तेदार 4 दिन के लिए आमंत्रित होते हैं। और बिना चुके ज्यादातर रिश्तेदार अपनी हाजिरी लगाते हैं।
आसपास के लोग भी निमंत्रण मिलने पर छठ व्रत वाले घरों में नहाए खाए में चावल दाल और खरना में आम की लकड़ी के जलावन से मिट्टी के चूल्हे पर बने खीर प्रसाद खाना अपना भाग्य समझते हैं।

सार्वजिक गणेशोत्सव के दौरान क्षेत्र के लोगों मे आपसी सहयोग, भाई चारा और उत्साह का उदाहरण महाराष्ट्र के हर गलियों मे देखा जा सकता है ठीक इसी तरह का माहौल बिहार झारखंड के हर शहर गाव और गलियों मे छठ पूजा के दौरान देखा जा सकता है। हर धर्म और जाती के लोग इसमे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है, कोई जातिए भेद भाव नही, कोई तनाव नहीं,

और इसका उदाहरण प्रशासनिक स्तर पर देखा जा सकती है। छठ पूजा के दौरान बिहार और झारखंड का अपराध का ग्राफ शून्य रहता है।

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