कल्याण-डोंबिवली की राजनीतिक बिसात पर शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। भले ही राज्य स्तर पर भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना एक साथ हों, लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में दोनों दल एक-दूसरे को अपनी ताकत दिखाने के लिए कमर कस चुके हैं।
हिंदीभाषी ‘वोट बैंक’ या सिर्फ ‘मोहरा’? कल्याण-डोंबिवली में भाजपा के ‘अज्ञात’ आत्मविश्वास का सच!
प्रमुख रणनीतियों का तुलनात्मक विश्लेषण
तुलना के बिंदु
भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
सभी 122 सीटों पर चुनाव लड़ने और अपने दम पर मेयर बनाने का लक्ष्य।
मुख्य चेहरा – रवींद्र चव्हाण (प्रदेश अध्यक्ष व MLA)
रणनीति – कार्यकर्ताओं को 122 उम्मीदवारों के लिए तैयार रहने का “इशारा”
मुख्य एजेंडा – मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस KDMC को भाजपा का मेयर देंगे।”
शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट)
सभी 122 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की पूरी तैयारी।
मुख्य चेहरा – एकनाथ शिंदे और निलेश राणे (स्टार प्रचारक) |
रणनीति अपनी स्वतंत्र ताकत बरकरार रखते हुए भाजपा को “चौंकाने” की नीति।
मुख्य एजेंडा – ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में अपने राजनीतिक गढ़ को सुरक्षित रखना।
भाजपा का रुख: आक्रामक और स्पष्ट
डोंबिवली में आयोजित ‘कार्यकर्ता संवाद बैठक’ में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं से 122 उम्मीदवारों को जिताने की अपील की है। चव्हाण का यह बयान कि “फडणवीस KDMC को भाजपा का मेयर देंगे”, सीधे तौर पर गठबंधन के सहयोगियों के लिए एक चेतावनी की तरह देखा जा रहा है। भाजपा यहाँ छोटे भाई की भूमिका निभाने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
शिंदेसेना का जवाब: जमीनी पकड़ और आक्रामकता
दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे अपनी राजनीतिक चतुराई से भाजपा को लगातार झटके दे रहे हैं। कोंकण में भाजपा को चुनौती देने वाले निलेश राणे को स्टार प्रचारक बनाकर शिंदे ने स्पष्ट कर दिया है कि वे मुंबई, ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में अपने वर्चस्व से समझौता नहीं करेंगे। शिंदे गुट अपनी ताकत के भरोसे भाजपा को बैकफुट पर धकेलने की रणनीति अपना रहा है।
निष्कर्ष: क्या होगा महायुति का भविष्य?
लोकसभा और विधानसभा में साथ दिखने वाली महायुति स्थानीय स्तर पर ‘फ्रेंडली फाइट’ की ओर बढ़ रही है या यह किसी बड़े राजनीतिक टकराव का संकेत है, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल, दोनों दलों की 122-122 सीटों पर तैयारी ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
बड़ी बात: जहाँ भाजपा शिंदे गुट को अपने प्रभाव में लेना चाहती है, वहीं एकनाथ शिंदे मंजे हुए खिलाड़ी की तरह अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रखने में अब तक सफल रहे हैं।
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