डोंबिवली – हर शहर का एक भौगोलिक, राजनीतिक या सामाजिक या सांस्कृतिक चेहरा होता है। लेकिन डोंबिवली शहर किसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला शहर नहीं है। इस शहर का ऐसा कोई अपना इतिहास नहीं है। भौगोलिक दृष्टि से यह शहर राष्ट्रीय या राज्य राजमार्ग पर भी नहीं है। आजादी के बाद से यह शहर हमेशा दक्षिणपंथी यानी हिंदुत्व के विचारों के समर्थको का गढ़ रहा है। इसके अलावा, डोम्बिवली न केवल राज्य में बल्कि पूरे देश में शिक्षित नागरिकों के शहर के रूप में जाना जाता है।
डोंबिवली को पूरे देश में महाराष्ट्र की सांस्कृतिक उप-राजधानी के रूप में भी जाना जाता है। इसके अलावा यह शहर मध्य रेलवे के मार्ग पर एक व्यस्त शहर के साथ सबसे ज्यादा कमाई देने वाले स्टेशन के रूप में विख्यात है। पिछले 15-20 वर्षों में, डोंबिवली के आसपास के कई शहरों का विकास हुआ है। जिनकी सूरत पूरी तरह बदल चुकी है।
39 वर्षों पूर्व निर्मित कल्याण डोंबिवली महानगर पालिका के बावजूद डोंबिवली शहर में कोई सुनियोजित विकास नहीं हुआ। डोम्बिवली कल जहा स्वर्ग जैसा था, आज अवैध निर्माणों के कारण नरक बनता जा रहा है। और कल अगर यहा कि स्थिति पूरी तरह से नारकीय हो जाए तो किसी को उसका दुख नहीं होगा। तो ऐसे मे एक प्रश्न उठना लाजिमी है कि इस शहर को पढ़े-लिखे लोगों का शहर क्यों कहा जाता हैं?
डोंबिवली को कभी नौकरीपेशा और लोगों का एक शांत शहर के रूप में जाना जाता था। 1983 में, कल्याण और डोंबिवली और आसपास के 84 गांवों को कल्याण डोंबिवली महानगर पालिका बनाने के लिए विलय कर दिया गया। 1990 के दशक में शहर की जनसंख्या वृद्धि दर में बढ़ोतरी होने लगी।
इसका मुख्य कारण यहा पागड़ी के आधार पर चालों में सस्ता किराया और अच्छे लेकिन अनाधिकृत मकान मिलने लगे, इसलिए नौकरीपेशा लोगों की संख्या डोंबिवली शहर की ओर बढ़ गई है। 1995 से 2020 के बीच पिछले 25 सालों से कल्याण डोंबिवली मानप की सत्ता दक्षिणपंथी शिवसेना और बीजेपी के पास थी. इतना ही नहीं, इस शहर ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में शिवसेना-बीजेपी के विधायकों और सांसदों को स्थायी रूप से चुना है.
लेकिन इसके साथ एक शर्मनाक सत्य यह कि डोंबिवली के आसपास के शहरों के साथ मुंबई महानगरीय क्षेत्र के अन्य शहरों की तुलना में डोंबिवली विकास से मीलों दूर रहा है, यह सच्चाई कितनी भी कड़वी क्यों न हो , उसे स्वीकार करना होगा।
25-30 साल पहले कल्याण डोम्बिवली का 75 प्रतिशत एक विधानसभा क्षेत्र था आज कल्याण डोंबिवली नगरपालिका क्षेत्र में चार विधानसभा और दो लोकसभा क्षेत्र बन गए हैं। इसके अलावा इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कल्याण डोंबिवली 227 नगरसेवकों की फौज होने के बावजूद भी सुनियोजित तरीके से विकास नहीं कर पाया है.
डोंबिवली शहर की प्रसिद्धि पूरे महाराष्ट्र और देश में बहुत अधिक है क्योंकि डोंबिवली देश के सौ प्रतिशत शिक्षित नागरिकों का शहर है। डोंबिवली को लेखकों और पत्रकारों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। इसके अलावा, डोंबिवली एक सांस्कृतिक शहर के रूप में जाना जाता है। इस वजह से, जिन लोगों ने डोंबिवली को कभी नहीं देखा है, उनमें डोंबिवली शहर के बारे में बड़ी जिज्ञासा है। हालांकि, उनके लिए दूर के ढोल सुहावन कहावत सही साबित होगी।
कल्याण डोंबिवली महानगरपालिका क्षेत्र की नगर विकास योजना 1997 में बनाई गई थी। यह नगर विकास योजना अगले 20 वर्षों में बढ़ती हुई जनसंख्या को मानकर तैयार की गई थी। इसमें नगर विकास योजना नियमावली के तहत मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए रिक्त भूमि पर आरक्षण किया गया था। हालाँकि, 27 गाँवों में बड़े पैमाने पर आरक्षण लागू किया गया, साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में किसी भी सुविधा के प्रावधान की कमी और अत्यधिक करों को लागू किया गया, जिससे नागरिकों में व्यापक आक्रोश था।
आंदोलन हुआ और 2003 में 27 गांवों को नगर निगम से हटा दिया गया।उन 27 गांवों के लिए ग्राम पंचायतें बनाई गईं। लेकिन बड़े पैमाने पर अनाधिकृत निर्माण के कारण इन 27 गांवों का शहरीकरण हो गया। इन 27 गांवों को 2015 में कल्याण डोंबिवली नगर निगम में फिर से शामिल किया गया था क्योंकि ग्राम पंचायतों के लिए बढ़ती आबादी को बुनियादी नागरिक सुविधाएं प्रदान करना असंभव था।
संघर्ष समिति ने मांग की कि इन 27 गांवों में स्वतंत्र नगरपालिका परिषद होनी चाहिए, जबकि यह सच है कि केवल महानगरपालिका ही इन गांवों का विकास कर सकती है। इस पर सरकार ने 27 में से 18 गांवों को बाहर करने का फैसला किया। लेकिन उस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने इन 18 गांवों को केडीएमसी में रखने का फैसला किया। उस फैसले को राज्य सरकार और केडीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इन सभी हालत मे इन गांवों की हालत फूटबाल जैसी होगई । इसलिए 27 गांवों की हालत भी दिन व दिन बदतर होती चली गई ।
डोंबिवली शहर डोंबिवली और कल्याण ग्रामीण नामक दो विधानसभा क्षेत्रों के अंतर्गत आता है।इसलिए, इस शहर में दो विधायक, एक सांसद और लगभग 50 नगरसेवक हैं। इतने प्रतिनिधियों के साथ इस शहर का विकास तेजी से होना चाहिए था। लेकिन यह समय है कि कलवा-मुंब्रा शहर के नागरिकों को डोंबिवली के नागरिकों से बेहतर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। क्योंकि उस छोटे शहर के नागरिक भले ही डोंबिवली से कम पढ़े-लिखे हों, लेकिन वे स्मार्ट और जागरूक हैं।
20-25 साल पहले कलवा-मुंब्रा नाम किया जाए तो शरीर मे कांटे आ जाया करते थे। लेकिन आज सवाल उठता हैकि उसी कलवा-मुंब्रा में आज क्या नहीं है? मुंब्रा में सभी सड़कें चौड़ी और पक्की हैं। मुंब्रा में ट्रैफिक की भीड़ को देखते हुए संवेदनशील क्षेत्र होने के बावजूद मुंब्रा में सभी सड़कों को चौड़ा किया गया। फ्लाईओवर और बाइपास सड़कें बनीं। थाना क्षेत्र में सुधार किया गया।
कल्याण डोंबिवली नगर निगम की विकास योजना 2017 में समाप्त हो गई। 5 साल हो जाने के बाद भी कोई नई विकास योजना बनाने का नाम नहीं ले रहा है और शहर में पुरानी विकास योजना के अनुसार सड़कों को चौड़ा नहीं किया जा रहा है. डोंबिवली नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत को चरितार्थ करने वाला शहर वन गया है।
इस शहर में कोई बड़ी चार लेन की सड़क या फ्लाईओवर पुल नहीं है। डोंबिवली में कोई बड़ा चौक या ट्रैफिक सिग्नल नहीं है। डोम्बिवली शहर के नागरिकों के पास शास्त्री नगर नामक एक बड़ा मनपा अस्पताल है। लेकिन अभी भी गंभीर या दुर्घटनाग्रस्त मरीजों के इलाज की कोई सुविधा नहीं है।
डोंबिवली पश्चिम में पांच श्मशान घाट हैं लेकिन फिर भी दाह संस्कार के लिए डोंबिवली पूर्व जाना पड़ता है। डोंबिवली शहर की आबादी को देखते हुए, नगर नियोजन नियमों के अनुसार कम से कम 10 सब्जी और मछली बाजारों की आवश्यकता है, लेकिन सब्जी या मछली बाजार नहीं है। डोंबिवली शहर में रिक्शा के अलावा कोई सार्वजनिक परिवहन नहीं है। आसपास के कस्बे बदल गए हैं। पिछले 25 वर्षों में नगरसेवक, विधायको की निजी जिंदगी तो बदल गए हैं, लेकिन डोंबिवली नहीं बदला है। यह ज्यों का त्यों है।
साभार – वरिष्ठ पत्रकार विजय राऊत के सौजन्य से
अनुवादित
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