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राज ठाकरे के ‘गैर मराठी’ मुद्दे पर देवेंद्र फडणवीस की चुप्पी: रणनीति या विवशता?

राजेश सिन्हा

महाराष्ट्र की राजनीति में ‘मराठी बनाम गैर मराठी’ का मुद्दा समय-समय पर उभरता रहा है। खासकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के प्रमुख राज ठाकरे इस मुद्दे को केंद्र में लाकर सामाजिक और राजनीतिक बहस को हवा देते रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में उनके भाषण को लेकर दायर याचिका ने एक बार फिर इस विवाद को चर्चा में ला दिया।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक बात विशेष रूप से ध्यान खींचती है, और वह है मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की चुप्पी। क्या यह चुप्पी महज़ संयोग है या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी है?

  1. संभावित राजनीतिक गठबंधन की संभावना

भाजपा और एमएनएस के बीच सीधा गठबंधन भले न हो, लेकिन भाजपा ने अतीत में राज ठाकरे की कांग्रेस और शिवसेना विरोधी बयानबाज़ी का अप्रत्यक्ष लाभ उठाया है। महाराष्ट्र में भाजपा का मुख्य विरोध शिवसेना (उद्धव गुट), एनसीपी (शरद पवार गुट), और कांग्रेस हैं।

ऐसे में राज ठाकरे जैसे नेता, जो इन्हीं विरोधियों के खिलाफ हमलावर हैं, भाजपा के लिए उपयोगी हो सकते हैं — भले ही प्रत्यक्ष रूप से न सही। इस कारण मुख्यमंत्री फडणवीस राज ठाकरे से टकराव की स्थिति से बचते हैं।

  1. मराठी अस्मिता का संवेदनशील मुद्दा

महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता केवल एक भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और राजनीतिक अस्त्र भी है। राज ठाकरे इसे अक्सर गैर मराठी लोगों के विरुद्ध प्रस्तुत करते हैं, जबकि भाजपा इसे ‘सभी भाषाओं और संस्कृतियों’ की समानता के नजरिए से देखना चाहती है।

लेकिन किसी भी सत्ताधारी मुख्यमंत्री के लिए मराठी अस्मिता के खिलाफ जाना एक जोखिम भरा कदम हो सकता है, विशेषकर तब जब वह स्वयं मराठी समुदाय से आते हों।

  1. एमएनएस की वर्तमान राजनीतिक स्थिति

वर्तमान में एमएनएस की राजनीतिक ताकत सीमित है। पिछले चुनावों में पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिली है। ऐसे में भाजपा और देवेंद्र फडणवीस इस पार्टी को एक गंभीर खतरे के रूप में नहीं देखते, और यही कारण है कि इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता महसूस नहीं करते।

  1. सामाजिक तनाव से बचाव

राज ठाकरे के बयान अक्सर उत्तर भारतीयों के खिलाफ होते हैं, जो मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में बड़ी संख्या में रहते हैं। एक सत्ताधारी मुख्यमंत्री के रूप में फडणवीस की जिम्मेदारी होती है कि वे ऐसे विवादों में कूदने से पहले सामाजिक संतुलन बनाए रखें।

यदि वे बहुत तीखी प्रतिक्रिया देते हैं, तो मराठी बनाम गैर मराठी के नाम पर समाज में ध्रुवीकरण बढ़ सकता है, जो सरकार के लिए एक और चुनौती बन सकता है।

  1. भाजपा की राष्ट्रीय नीति और क्षेत्रीय संतुलन

भाजपा की नीति रही है कि वह सभी राज्यों में एक राष्ट्रवादी और विकास केंद्रित पार्टी के रूप में खुद को पेश करे। क्षेत्रीय मुद्दों पर अति प्रतिक्रिया देना इस छवि के विपरीत हो सकता है। इसलिए भी देवेंद्र फडणवीस जैसे नेता ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर संयमित प्रतिक्रिया देते हैं।

देवेंद्र फडणवीस की राज ठाकरे के ‘गैर मराठी’ मुद्दे पर चुप्पी एक सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है। यह केवल एक राजनीतिक विवशता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी संतुलन साधने की कोशिश है

जिसमें गठबंधन की संभावनाएं, सामाजिक स्थिरता और सांस्कृतिक भावनाएं, तीनों का ध्यान रखा गया है। हालांकि, यह चुप्पी कब तक बनी रहेगी, यह आने वाले चुनावी समीकरण और सामाजिक प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करेगा।

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