बुरखा पर प्रतिबंध और घूंघट !
(कर्ण हिन्दुस्तानी )
शिवसेना ने देश में बुरखा पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर एक नयी बहस छेड़ दी है। इस बहस में हिस्सा लेकर प्रसिद्द गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि यदि बुरखा पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो मैं इस बात का समर्थन करता हूँ लेकिन इसके साथ ही राजस्थान में घूंघट पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए। जावेद अख्तर का कहना उनके कट्टर विचार धारा का ही प्रतीक है.
हिन्दुस्तान की संस्कृति में घूंघट लाज़ का प्रतीक है। ना की बुरखा की तरह चेहरा ढंकना है कानूनी ज़रूरत पड़ने पर भी बुरखा चेहरे से ना हटाना है।चुनाव मतदान में बुरखा पहने पुरुष के बोगस मतदान करते पड़े जाना अपने देश में धर्म की आड़ में क्या क्या होता है यह सभी जानते हैं। बुरखा की आड़ में कई बार आतंकी घटनाओं को भी अंजाम दिया गया है। जबकि ऐसी कोई घटना आज तक सामने नहीं आयी है कि घूंघट की आड़ आतंकवादी घटना को अंजाम देकर फरार हो गया।
बुरखा को घूंघट से जोड़ना ना सिर्फ जावेद अख्तर की ओछी मानसिकता को दर्शाता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि किसी भी मुद्दे के सामने कोई भी मुद्दा पेश कर उसपर बयानबाज़ी कर हंगामा खड़ा करना कुछ लोगों का पेशा है। फ्रांस सहित कई मुस्लिम देशों में बुरखा पर प्रतिबंध है। इन देशों में महिलाएं शरीर तो ढंक सकतीं हैं मगर उन्हें अपना चेहरा खुला रखना होता है। मेरी जानकारी में बुरखा का दुरूपयोग भी देखा गया है। एक नहीं कई बार देखा गया है।
एक लड़की जो गैर मुस्लिम थी अपने घर वालों को बताये बगैर एक मुस्लिम लड़के के साथ रहने चली गई। उस मुस्लिम लड़के ने उस लड़की को बुरखा दे दिया और जब भी वह लड़की घर आती – जाती थी बुरखा पहनती थी। घर से बाहर निकलते ही वह लड़की ऑटो में बुरखा उतार कर जींस की पेंट और टी शर्ट में आ जाती थी। शाम को लड़के के घर वापस जाने पर वह लड़की फिर ऑटो में बुरखा पहन लेती थी। आस पास के लोगों के हिसाब से वह लड़की उस मुस्लिम लड़के की बीवी थी।
मगर सच यह था कि उस मुस्लिम लड़के ने अपनी बीवी को गाँव में रखा हुआ था और यहां इस लड़की के साथ मौज कर रहा था। बुरखा की आड़ में किसी को कुछ समझ ही नहीं आया। यदि बुरखा इस्लाम में पाक है तो क्या यह इस्लाम का अपमान नहीं है ? जबकि घूंघट में ऐसा नहीं है। घूंघट वाली महिलाएं वक़्त पड़ने पर अपना चेहरा दिखाने में परहेज़ नहीं करतीं। मगर बुरखा वाली महिलाएं मतदान जैसे वक़्त पर भी चेहरा दिखाने को लेकर ऐतराज़ जताती आईं हैं। ऐसे में जावेद अख्तर जैसे लोगों का बुरखा की तुलना घूंघट से करना ना सिर्फ बेमानी है बल्कि उनकी छोटी मानसिकता को भी दर्शाता है।

