उद्धव ठाकरे – एक दिग्भ्रमित मुख्यमंत्री
(कर्ण हिन्दुस्तानी )
किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री अपने आप में राज्य की जनता का सबसे बड़ा माय -बाप होता है, मगर महाराष्ट्र इस बारे में अपवाद साबित हो रहा है क्योंकि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे जिस तरह से बर्ताव कर रहे हैं उससे पता चलता है कि वह दिग्भ्रमित हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि कोरोना के इस संकट काल में क्या किया जाए ?
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शुक्रवार को जब उद्धव ठाकरे जनता को सम्बोधित कर रहे थे तब उनके चेहरे और शब्दों से हताशा झलक रही थी। वह देश के बाकी राज्यों में कोरोना की स्थिति पर चर्चा नहीं करना चाहते थे लेकिन फ़्रांस , रूस , इटली , ब्राजील और अन्य देशों की स्थिति के बारे में बोल रहे थे।
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…. बिना नाम लिए एक उद्योगपति और विपक्षी दलों को जिस तरह से उद्धव ठाकरे ने फटकार लगाई वह किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को शोभा नहीं देता है। ..
महाराष्ट्र में पिछले एक माह में कोरोना संक्रमितों की संख्या जिस तरह से बढ़ी है वह राज्य सरकार की लापरवाही का ही नतीजा कहा जा सकता है क्योंकि हर जिले में सावधानी नहीं बरती गयी।
सही ढंग से कहीं भी जनता को जागृत नहीं किया गया। सिर्फ मास्क ना पहनने वालों से दण्ड वसूला गया। व्यापारियों को कोरोना संकट का भय दिखाकर व्यवसाय करने से रोका गया।
मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कई बार जनता को सम्बोधित किया लेकिन हर बार उनका सम्बोधन धमकी भरा ही रहा। यदि जनता ने सरकार की बात नहीं मानी तो पुनः लॉक डाउन करना पडेगा,
यह धमकी सुन-सुनकर जनता भी ऊब चुकी है। खुद मुख्यमंत्री की पत्नी और विधायक बेटा कोरोना संक्रमित पाए गए हैं।
अब सवाल यह उठता है कि जब इतनी व्यवस्था होने के बावजूद मुख्यमंत्री का परिवार कोरोना संक्रमित हो सकता है तो आम जनता का क्या ?
जिसे रोज़ सुबह उठकर रोटी कमाने निकलना है , जनता को लाइट बिल भरना है और अन्य खर्चे भी उठाने हैं। वह काम पर निकलेगा तभी तो कुछ जुगाड़ कर सकेगा।
ऐसे में आम जनता पूर्ण रूप से सावधानी नहीं बरत पाएगी। अब फिर वही यक्ष प्रश्न आ जाता है कि संक्रमितों की संख्या को कैसे कम किया जाए।
तो सीधा सा उपाय है सप्ताह में दो दिन (शनिवार – रविवार ) पूर्ण लॉक डाउन किया जाए और सिवाय चिकित्सा सुविधा के कुछ भी खुला ना रखा जाए।
यदि ऐसा किया जाए तो बचाव तथा रोकथाम सम्भव है। ….. नहीं तो अपने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तो वैसे भी दिग्भ्र्मिता के शिकार हैं ही।
