(कर्ण हिंदुस्तानी )
विभिन्न घोटालों को अपने समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित करने वाले देश के लगभग सभी समाचार पत्र केंद्र और राज्य सरकारों को हर माह करोड़ों का चूना लगाकर अपनी तिजोरी भर रहे हैं। सरकारी बाबुओं की नासमझी का फायदा उठाकर यह आर्थिक घोटाला बरसों से चल रहा है। यदि इस घोटाले की रकम विभिन्न समाचार पत्रों से वसूली जाए तो केंद्र तथा राज्य सरकारों की तिजोरी में काफी रकम आ सकती है। साथ ही साथ समाचार पत्रों की बे ईमानी भी सामने आ जाएगी।
गौरतलब हो कि केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न जनउपयोगी कार्यों की निविदाएं देश भर के विभिन्न समाचार पत्रों में हर दिन प्रकाशित की जातीं हैं। इन निविदाओं के प्रकाशन के लिए केंद्र सरकार ने डी ए वी पी (Directorate of Advertising and Visual Publicity) के तहत मूल्य तय किये हैं। जबकि राज्य सरकार डी जी आई पी आर ( Directorate General of Information and Public Relations ) के तहत तय किये गए मूल्यों के अनुसार विभिन्न समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करवाती है। यह मूल्य समाचार पत्रों की खपत के अनुसार तय किये जातें हैं। रोज़ाना प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों का सरकार विज्ञापन मूल्य अलग होता है और साप्ताहिक तथा मासिक समाचार पत्रों का विज्ञापन मूल्य अलग होता है। डी ए वी पी और डी जी आई पी आर में हर प्रकाशन को पंजीकृत होना पड़ता है। समाचार पत्रों को अपनी सम्पूर्ण और सही जानकारी शपथ पत्र के साथ देनी होती है। इसके बाद सरकार बाबू अथवा वरिष्ठ अधिकारी विज्ञापन का मूल्य तय करते हैं। इस मूल्य के अनुसार ही सभी केंद्र तथा राज्य सरकारों (स्थानिक स्वराज्य संस्था सहित ) के विज्ञापन समाचार पत्रों को प्रकाशित करना बंधन कारक होता है। रोज़ प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों में सरकारी मूल्य अलग होता है और बाकी का मूल्य अलग होता है। अब समाचार पत्र के मालिकों को सरकारी नियम के अनुसार सप्ताह में एक दिन अवकाश रखना है। जिससे पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों को साप्ताहिक अवकाश का लाभ मिल सके।
समाचार पत्रों के मालिकों ने रोज़ प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों में रविवार को अवकाश घोषित करते हुए रविवार के लिए (साप्ताहिक )नया समाचार पत्र पंजीकृत करवा लिया। इस पंजीकरण में मूल नाम के साथ सिर्फ रविवार अथवा सन्डे जोड़ दिया। उदाहरण के लिए टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने रविवार को दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया के बजाए सन्डे टाइम्स प्रकाशित करना शुरू कर दिया। यह सन्डे टाइम्स अथवा सन्डे नवभारत टाइम्स सरकारी विभागों में (आर एन आई ) में साप्ताहिक समाचार पत्र है। इसका आर एन आई क्रमांक भी अलग है। इसके बावजूद इन नए साप्ताहिक समाचार पत्रों को जो केंद्र अथवा राज्य सरकारों की ओर से रविवार को प्रकाशित करने के लिए विज्ञापन दिए जातें हैं वह रोज़ाना वाले सरकारी मूल्य पर ही दिए जा रहे हैं। जबकि यह साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर आर एन आई में पंजीकृत हैं।
उदाहरण के लिए जब कोई सरकारी विज्ञापन टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए भेजा गया है और वह विज्ञापन सन्डे टाइम्स में प्रकाशित हो रहा है। तो गलत ही माना जाएगा। फिर भी बिल अदा किये जाते हैं। साप्ताहिक समाचार पत्रों को रोज़ प्रकाशित होने वाले मूल्यों पर कैसे बिल अदा किये जातें हैं ? इस तरह से देश भर के समाचार पत्र केंद्र तथा राज्य सरकारों को अब तक अरबों रुपयों का चूना लगा चुकें हैं. सभी समाचार पत्रों में यह बड़ा आर्थिक घोटाला सुचारु रूप से चल रहा है। दूसरों के घोटालों को मजे लेकर और चटपटा बनाकर प्रकाशित करने वाले समाचार पत्र अपनी गिरेबान में कब झांकेंगे यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है।