(मुंबई आसपास ब्यूरो )
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने भले ही एकतरफा जीत का स्वप्न देखा होगा मगर बीजेपी का यह स्वप्न भंग हो गया और आज बीजेपी को सत्ता के लिए शिवसेना की शर्तों पर निर्भर रहने की नौबत आ गयी है। शिवसेना भी बीजेपी की मजबूरी को जमकर भुनाने में लग गई है। इसकी वजह पर बीजेपी चिंतन करने के बजाए अपने ही बागियों को दोषी ठहराकर यदि अपना पल्ला झाड़ना चाहती है तो बीजेपी की यह सबसे बड़ी भूल होगी। खुद को राजनीती का चाणक्य समझने वाले बीजेपी के कुछ नेताओं को आत्मचिंतन करने की सख्त जरूरत है और इसके लिए ऐसे तथाकथित चाणक्यों को कुछ दिन के लिए सक्रीय राजनीती से भी दूर रहने की आवश्यकता है।
बात अगर २०१४ के विधानसभा चुनावों की करें तो बीजेपी – शिवसेना अलग – अलग चुनाव लड़ीं थीं। इन चुनावों में बीजेपी को १२२ सीटें हासिल हुईं थीं। इसके बाद बीजेपी ने शिवसेना को साथ लेकर सरकार बनाई और पांच साल तक शिवसेना की धमकियां सुन कर कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद २०१९ के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने शिवसेना के साथ गठबंधन किया और बीजेपी को १०० से भी कम सीटें हासिल हुईं।
देखने में बीजेपी को १०२ सीटें मिलीं हैं मगर यह सीटें कौन सी हैं ? कल्याण पूर्व की सीट गणपत गायकवाड़ (निर्दलीय ) को बीजेपी में शामिल करने के बाद हासिल हुई है। कल्याण पश्चिम की सीट शिवसेना के खाते में छोड़ कर बीजेपी के हाथों से यह सीट भी गयी। परली से पंकजा मुंडे चुनाव हार गयीं। नवी मुंबई की ऐरोली विधानसभा सीट पर बीजेपी की जीत बीजेपी की ना होकर गणेश नाइक की जीत है। मीरा भायंदर सीट पर बीजेपी के हेमेंद्र मेहता चुनाव हार गए। आज भले ही यहां से बीजेपी की बागी उमीदवार गीता जैन ने बीजेपी को अपना समर्थन दे दिया हो मगर बीजेपी ने यह सीट गंवा तो दी ही है।
बीजेपी के कई मंत्री चुनाव हार गए। बाहरी दलों से बीजेपी में प्रवेश करने वालों में से हर्षवर्धन चुनाव हार गए , उदयनराजे भोसले लोकसभा उपचुनाव हार गए। क्या ऐसी हार बीजेपी के लिए आगे का भविष्य तय करेगी ? बीजेपी से एकनाथ खड़से को दरकिनार करने के चक्कर में बीजेपी ने खड़से परिवार की उमीदवार की बेटी वाली सीट भी गंवा दी। राजनीती के दिग्गजों का अखाड़ा कही जाने वाली बीजेपी के इस अखाड़े के कई दिग्गज पहलवान चारों खाने चित्त हो गए।
यहां तक कि नागपुर की एक सीट पर भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। यह सब किस वजह से हुआ तो एक मात्र वजह सामने आती है और वह है बीजेपी का शिवसेना से गठबंधन की हामी भरना। विधानसभा चुनावों में बीजेपी के तमाम प्रचारकों ने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक का राग अलापा मगर इसमें महाराष्ट्र गायब था। इसकी वजह किसी को भी समझ नहीं आयी। देश के मुद्दों पर राज्य के चुनाव लड़ना कौन सी राजनीती है यह समझ के बाहर है। लेकिन इन चुनावों में बीजेपी को मिली शिकश्त यह बात इंगित करती है कि बीजेपी ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।
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