राज ठाकरे की हताशा और लोकसभा चुनाव
(कर्ण हिन्दुस्तानी )
लोकसभा चुनावों की डुगडुगी बजने की आशंका से ही कई राजनीतिक दलों में घबराहट फ़ैल गई है। इसी कड़ी में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना को भी पेचिस जैसी बीमारी हो गई है। मनसे के तेरहवें स्थापना दिवस पर मनसे प्रमुख के भाषण से तो यही लग रहा था।
लोग राज ठाकरे के मुँह से रणनीति के बारे में सुनने आये थे मगर सभी को निराशा ही हाथ लगी क्योंकि मनसे अभी तक लोकसभा चुनावों के बारे में अपनी रणनीति तय ही नहीं कर पायी है।
लोकसभा चुनाव लड़ने को लेकर असमंजस की स्थिति में फंसी मनसे के अध्यक्ष राज ठाकरे बातें तो सैन्य शक्ति की करते हैं , प्रधानमंत्री की कार्यप्रणाली पर ऊँगली उठाते हैं मगर लोक सभा में अपना सांसद भेजने के कतराते हैं। इसकी वजह भी साफ़ है , राज ठाकरे साफ़ जानते हैं कि महाराष्ट्र की जनता मनसे के नव निर्माण की परिभाषा समझ चुकी है।
महाराष्ट्र की समझदार जनता मराठी माणूस के मुद्दे पर अब लोक प्रतिनिधि नहीं चुनना चाहती , महाराष्ट्र की जनता अब महाराष्ट्र का चौमुखी विकास चाहती है। केंद्र की हर योजना का लाभ महाराष्ट्र की जनता तक कैसे पहुंचेगा ? जनता इस ओर ध्यान देना चाहती है।
किसी वीर रस के कवि की कविता की तरह ओजपूर्ण भाषण देकर जनता और श्रोताओं को अपने हित में ताली बजवाना आसान है मगर इन तालियों को वोट में तब्दील करना मुश्किल काम है। आज की तारीख में मनसे के पास सिर्फ एक विधायक है। इसकी वजह राज ठाकरे ने कभी तलाशी ही नहीं होगी।
शिवसेना प्रमुख की तरह ओजस्वी भाषण करना आसान है मगर उनकी तरह राजनीती के दांवपेंच खेलना आसान नहीं है। आज राज ठाकरे यदि शरद पवार की शगिर्दगी में जाने को आतुर हैं तो यह भी बाला साहेब की शरद पवार से नज़दीकियों की वजह से ही हो रहा है।
लोकसभा चुनाव में हिस्सा ना लेना राज ठाकरे की राजनीतिक हताशा को ही दर्शाता है।
यदि राजनीती करनी है तो अपनी भूमिका साफ करनी ही होगी। वरना आने वाले समय में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना की गिनती किसी गणपति मित्र मंडल से ज्यादा में नहीं होगी।

