चमचों की रखैल बन गई है महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी !
महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की नई कार्यकारिणीं देख कर महाराष्ट्र के हिंदी साहित्य की दुर्दशा का स्पष्ट आभास हो जाएगा। इस अकादमी पर साहित्यकारों का नाम मात्र और गैर साहित्यकारों का कब्ज़ा हो चुका है। जिन्होंने अपने जीवन में समाचारों और राजनीतिक आलेखों के सिवा कुछ भी ऐसा नहीं लिखा है जिसे साहित्य कहा जाए , वह इस साहित्य अकादमी की नई कार्यकारिणी में कुंडली मार कर बैठ गए हैं। जिससे पता चलता है कि महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी चमचों की रखैल बन चुकी है।
नई कार्यकारिणी पर नज़र घुमाने पर पता चलता है कि चंद लोगों को छोड़ दें तो इस अकादमी पर तथाकथित बड़े अखबारों के पत्रकारों का ही कब्ज़ा हो गया है। जिनमें एक सुरक्षा एजेंसी के मालिक (जिन्होंने धन के बल पर अखबार खरीदा ) का अखबार हमारा महानगर के सम्पादक राघवेंद्र दिवेदी , पत्रकारों से खबर कम और विज्ञापन ज्यादा जुटाने के लिए दवाब बनाने वाला दैनिक नवभारत के शहर सम्पादक बृजमोहन पांडेय , पत्रकार प्रकाश काथे , नवभारत टाइम्स के अभिमन्यु शितोले , भाजपा नेता अमरजीत मिश्रा और संतोष सिंह का मुख्य रूप से समावेश है। उपरोक्त लोगों में से किसी ने भी साहित्य में अपना कोई योगदान नहीं दिया है। फिर यह लोग साहित्य अकादमी में क्या कर रहे हैं ?
मुंबई और महाराष्ट्र में हिंदी के साहित्यकारों की कमी नहीं है। मगर धनपशुओं के मालिकाना हक़ वाले समाचार पत्रों के पत्रकार हिंदी साहित्य अकादमी में घुसपैठ कर चुकें हैं। मंत्रियों की चमचागिरी कर अकादमी में घुसपैठ करने वाले इन चमचा गिरी वाले पत्रकारों को किसने अकादमी में शामिल किया यह खोज का विषय है। सूत्रों पर यदि यकीन करें तो कुछ साल पहले अकादमी पर लाखों रुपयों के घपले का भी आरोप लगा था। मगर उस आरोप की कोई जांच नहीं हुई। एक मराठी समाचार पत्र ने उक्त घोटाले की खबर विस्तार से प्रकाशित भी की थी। उसके बाद सूचना अधिकार के तहत जानकारी भी मांगी गई थी। किन्तु बड़े लोगों और नामचीन पत्रकारों की मिलीभगत से कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई गई। अब अकादमी में फिर चमचों का बोलबाला हो गया है। इस बारे में हिंदी साहित्य से जुड़े कई लोगों ने नाराज़गी जाहिर की है।

