हिंदी साहित्य अकादमी का सामूहिक बलात्कार हो चुका है – डॉ वागीश सारस्वत
(कर्ण हिन्दुस्तानी )मुंबई आसपास में कल महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की नई कार्यकारिणी में पत्रकारों की घुसपैठ पर खबर प्रकाशित की गई थी। इस खबर के पश्चात साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी को लेकर मुंबई के साहित्यकारों ने कड़ी प्रतिक्रया व्यक्त की है। कई कृतियों के रचनाकार डॉ वागेश सारस्वत ने अपनी प्रतिक्रया में कहा है कि महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का सामूहिक बलात्कार हो चुका है। सारस्वत जी पूरी प्रतिक्रया मुंबई आसपास में ज्यों की त्यों प्रकाशित की जा रही है , पाठक गण पढ़ सकतें हैं।
डॉ वागीश सारस्वत -सहित्य और पत्रकारिता दो अलग चीजें हैं। जिन लोगों को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का सदस्य मनोनीत किया गया है वो ज्यादातर मेरे मित्र हैं। इस तरह के किसी सरकारी संस्थान की सदस्यता मित्रों को मिले तो खुशी ही होगी। पर एकाध पत्रकार को मिलती तो बात समझ में आती। यहां जो सदस्य बनाये गए हैं उसमें पत्रकारों की संख्या ज्यादा है। उसमें में सभी पत्रकार ऐसे हैं जो संपादक, शहर संपादक या ब्यूरो चीफ के पद पर कार्यरत हैं। जिनमें से सभी का साहित्यिक योगदान इतना है कि साहित्यिक आयोजनों की रिपोर्ट सकारात्मक रूप से इनके अखबारों में प्रकाशित होती हैं। भविष्य में सरकार को इसका लाभ निरन्तर मिलता रहे शायद इसी मकसद से इतनी बड़ी संख्या में पत्रकार मित्रों को सदस्य के तौर पर नामित किया गया है। मैं चाहकर भी विरोध नहीं कर सकता। मित्रों के चेहरे पर मुस्कराहट है तो मैं क्यों हिंदी राज्य सहित्य अकादमी के फ़टे में टांग अड़ा दूं। विरोध करने से मुझे तो कार्यकारी अध्यक्ष बना नहीं दिया जाएगा। इन पत्रकार मित्रों इतना जरूर कहूँगा कि अब जब जोड़तोड़ करके साहित्य अकादमी के सदस्य बन ही गए हो तो अपने कार्यकाल में कमसे कम एक साहित्यिक कृति का तो प्रकाशन करवाइये। परंतु प्रकाशन से पहले लिखना तो पड़ेगा। चलिए साहित्य की विधा कविता, कहानी, नाटक, संस्मरण, उपन्यास छोड़िये पत्रकारिता पर ही एक कृति रच डालिये। वैसे चेहरे पर कालिख पुतने से बचाने का एक और तरीका है कि जितने पत्रकार मित्र सदस्य बने हैं वो सब मिलकर एक कृति रच डालें। इतने लेखकों द्वारा एक कृति लिखने से विश्व कीर्तिमान भी बन जायेगा और महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की इज्जत भी बच जाएगी । अरे भाई ये साबित हो जाएगा कि ये सिर्फ पत्रकार नहीं साहित्य के सच्चे लेखक हैं। हिंदी साहित्य अकादमी का सामूहिक बलात्कार तो हो ही चुका है अब एक कृति लिखकर सामूहिक विवाह भी कर लिया जाये। मुझे पक्का तो नहीं है पर शायद बलात्कार करने वाला व्यक्ति बलात्कृत से विवाह कर ले तो कानून उसे माफ़ कर देता है।
इसी तरह से अकादमी से सम्मानित हो चुके युवा साहित्यकार पवन तिवारी ने भी नई कार्यकारिणी पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पाठकों के लिए हम पवन तिवारी की प्रतिक्रिया भी ज्यों की त्यों प्रकाशित कर रहे हैं।
पवन तिवारी – साहित्य अकादमी में साहित्यकारों को ही होना चाहिए, यदि संभव न हो तो कम से कम 70 प्रतिशत तो होने ही चाहिए। अन्यथा साहित्य जगत में उसका प्रतिकूल संदेश भी जाएगा और अकादमी के निर्णयों में उसकी कमी भी खलेगी। वैसे भी आज-कल ऐसे संस्थानों की विश्वनीयता के संकट का दौर चल रहा है। ऐसे में सरकार और साहित्यकारों दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे बड़े संस्थानों की गरिमा बनाये रखने में विश्वसनीय प्रयास करें।
वहीँ वरिष्ठ कवी जयप्रकाश मिश्र मिलिंद जी ने अपनी बात काव्य के रूप में रखी है
जयप्रकाश मिश्र मिलिंद – पूरे कुंए में भांग घुल गई है
नाग देवता चबूतरे पर फन फैलाए बैठे हैं ।सारी हवा जहर से भींग गई है।लगता है सच की नीयत बदल गई है।
महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य की कार्यकरिणी को लेकर हुए बवाल पर बाकी साहित्यकारों की प्रतिक्रया भी मुंबई आसपास में प्रकाशित की जाएंगी। यदि कोई अपनी प्रतिक्रया देना चाहता है तो उसका स्वागत है।

