(कर्ण हिन्दुस्तानी )
पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय राजीव गाँधी के घनिष्ठ मित्रों में शुमार होने वाले सैम पित्रोदा ने सिख विरोधी दन्होन को जो हुआ सो हुआ कहकर भले ही नए विवाद को जन्म दे दिया मगर पित्रोदा ने कांग्रेस की मानसिकता को ही तो दर्शाया है यह कोई क्यों नहीं मानता। खुद राजीव गाँधी ने कहा था जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती ही है। कांग्रेस को ना तो कभी देश के बंटवारे के समय हुए दंगों पर कोई अफ़सोस हुआ है। ना आज़ादी की जंग के सामय जालियां वाला काण्ड का अफ़सोस हुआ है , ना मुज़फ्फर पुर में हुए दंगों का अफ़सोस हुआ है। कांग्रेस को सिर्फ और सिर्फ गुजरात दंगों का अफ़सोस हुआ है।
मानो बाकी के दंगों में जानवर मारे गए थे और सिर्फ गुजरात दंगों में इंसान मारे गए हैं। कांग्रेस की मानसिकता कितनी गिरी हुई है इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण पित्रोदा का जो हुआ – सो हुआ वाला वक्तव्य है। इस बारे में भले ही पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कॅप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने तरीके से सैम पित्रोदा के बयान की निंदा की है। मगर सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस के नए और पुराने नेताओं की संवेदनाएं मर गयीं हैं ? अब तक सिख विरोधी दंगों के आरोपियों को सज़ा तक नहीं हुई है और कांग्रेस वाले जो हुआ – सो हुआ , का राग अलापने लगे हैं।
यदि कोई गैर कांग्रेसी राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी समेत मोहनदास करमचंद गाँधी की ह्त्या को जो हुआ – सो हुआ कहकर भूल जाने को कहता तो देश भर में बवाल मच जाता। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी के राजीव गाँधी संबंधी वक्तव्य मर कांग्रेस ने मचाया हुआ है। इन लोकसभा चुनावों में अपनी संभावित पराजय को देखते हुए कांग्रेस के हर नेता की जुबां फिसलती जा रही है।
इनको दंगों का दर्द पता ही नहीं है। आज भी पंजाब के दंगा पीड़ितों के मन में तीस मौजूद है। यह तो साहसी सिख कौम का कमाल है कि उन्होंने अपने कर्तव्य के बल पर खुद के ऊपर जबरन थोपे गए आतंकवादी शब्द को धो दिया है। वरना कांग्रेस ने तो कोई कसर दंगों नहीं छोड़ी थी। सिख कौम को बदनाम करने के लिए। दंगों का दर्द वही जान सकता है जो दंगा पीड़ित होता है।
दंगों के दर्द को बयान करता एक शेर है
नेताओं को कभी सीधे चलते नहीं देखा
फितरत को सपोलों की कभी बदलते नहीं देखा
पढ़ते हैं मजे ले लेकर दंगों की वह खबरें
घर अपना जिन्होंने कभी जलते नहीं देखा।
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