(कर्ण हिन्दुस्तानी )
लोकसभा चुनावों के छठे दौर की आज वोटिंग सम्पन्न हो रही है। सातवें और अंतिम दौर की वोटिंग १९ मई को सम्पन्न होगी , इसके बाद २३ मई को परिणाम सामने आ जाएंगे। इन परिणामों के बाद किसकी लाटरी लगेगी यह तो वक़्त ही बताएगा। मगर यह लोकसभा चुनाव देश को सदियों तक याद रहेगा क्योंकि पहली बार चुनाव प्रचार में गलिच्छ भाषा का इस्तेमाल किया गया है।
खासकर कांग्रेस ने जिस तरह से प्रधानमंत्री को चोर कहते हुए अपनी चुनावी रैलियां की और अमेठी में कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी ने बच्चों से मोदी विरोधी नारे लगवाए वह देश की राजनीती में नीचता की चरम सीमा पार करने वाला क्षण था। चुनाव प्रचार के पहले दिन से ही राहुल गाँधी की रैलियों में चौकीदार चोर है के नारे राहुल के इशारों पर लगवाए गए। प्रधानमंत्री को इस तरह से सम्बोधित करना कांग्रेस की मानसिकता पहले कभी नहीं थी। मगर इन चुनावों में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने सारी हदें पार कर दीं। जवाब में प्रधानमंत्री ने सिर्फ एक बार ढंग से जुबां खोली और कांग्रेस को मिर्ची लग गई।
इन चुनावों में प्रधानमंत्री की वयोवृद्ध माँ को भी खींचा गया , उनपर भी टीका टिप्पणी की गई। इतना ही नहीं सपा नेता आजमखान ने तो महिलाओं के अंतर्वस्त्रों के रंग का ज़िक्र कर सारी हदें पार कर दीं। मायावती ने तो प्रधानमंत्री की जाती तक पर ऊँगली उठाने से परहेज़ नहीं किया। बसपा – सपा और कांग्रेस पिछड़ों की बात करते हैं , पिछड़ों को न्याय दिलाने की बात करते हैं। मगर जब कोई पिछड़े वर्ग का प्राधानमंत्री बन जाता है तो यही लोग उस पिछड़े वर्ग वाले व्यक्ति की जाती को ही संदेह के घेरे में खड़ा कर देतें हैं क्योंकि वह व्यक्ति बीजेपी से प्रधानमंत्री बना है।
सवाल यह भी लाज़मी है कि सपा – बसपा और कांग्रेस में मायावती , अखिलेश और राहुल गाँधी के अलावा कोई आम व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है क्या ? जवाब ना में ही मिलेगा क्योंकि यह सभी सत्ता पिपासु हैं। इनको जनता की नहीं अपने विकास की चिंता है। इनके पुतले लगते रहने चाहियें , इन इशारों पर जैसे होते रहने चाहियें , इनके बाप दादा के नाम पर देश की परियोजनाएं चलनी चाहियें। इन्हें देश की हर दीवार पर अपने घराने का नाम चाहिए। इसके लिए यह सब प्रधानमंत्री को चोर बोल सकते हैं , औरंगज़ेब बोल सकतें , लाशों का सौदागर बोल सकतें हैं, दंगाई बोल सकतें हैं , गंदी नाली का कीड़ा और फेकू बोल सकतें हैं। मोदी विरोधियों की मानसिकता की वजह से ही इस बार के लोकसभा चुनावों को गलिच्छ मानसिकता वाले चुनाव के रूप में याद रखा जाएगा।
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