(ABI News)
बलिया। प्रधान पद की ललक ने एक व्यक्ति का जीवन भर ब्रह्मचारी बने रहने का संकल्प तुड़वा दिया। ग्राम प्रधान का पद महिला कोटे में आने पर ब्रह्मचारी ने अपना संकल्प तोड़ा और आनन-फानन अदालत में जाकर बिना मुहुर्त ही शादी रचा ली। ब्रह्मचर्य तोड़कर गृहस्थ का जीवन शुरू करने वाले अब आगे का फैसला समाज के सुपुर्द कर दिया है।
दरअसल जनपद बलिया के विकासखंड मुरली छपरा के ग्राम पंचायत शिवपुर करण छपरा निवासी 45 वर्षीय हाथी सिंह ने जीवन भर ब्रह्मचारी रहने का संकल्प लिया था। लगभग एक दशक तक समाज सेवा करने के बाद उनके भीतर ग्राम प्रधान बनने की महत्वकांक्षी जागृत हो गई। वर्ष 2015 में हाथी सिंह ने प्रधान पद के लिए अपना नाम निर्देशन पत्र दाखिल किया और चुनावी मैदान में कूद गए। गांव वालों ने भी उन्हें निराश नही होने दिया और भरपूर भी वोट दिए। लेकिन मात्र 57 वोटों के अंतर से हारकर वह उपविजेता रहे। हाथी सिंह उसी समय से अगले चुनाव की आस लगाए हुए थे। दुर्भाग्य से शासन द्वारा वर्ष 2015 के अनुसार आरक्षण का निर्धारण किए जाने से गांव का प्रधान पद महिला कोटे में चला गया। जिससे पांच साल से चुनाव की तैयारी कर रहे हाथी सिंह के भीतर निराशा घर कर गई। समर्थकों ने उन्हें उदासी में डूबा हुआ देखकर हाथी सिंह को शादी कर पत्नी को चुनाव लड़ाने का सुझाव दिया। काफी समझाने पर हाथी सिंह ने समर्थकों के सुझाव पर अमल करते हुए ब्रह्मचारी का जीवन छोड़कर गृहस्थ जीवन में उतर कर शादी करने की ठान ली। पहले बिहार की अदालत में हाथी सिंह ने एक युवती के साथ कोर्ट मैरिज की। इसके बाद 26 मार्च को गांव के धर्मनाथ जी मंदिर में पहुंचकर गांववालों के सामने शादी रचा ली।
उन्होंने कहा कि 13 अप्रैल को नामांकन होना है, इसलिए समय से पहले ही शादी करनी थी। इसी वजह से आनन-फानन में शादी का आयोजन किया गया। बिना मुहूर्त ही उन्होंने शादी रचा ली। हाथी सिंह की नई नवेली दुल्हन अभी स्नातक स्तर की पढ़ाई कर रही है और शादी रचाते ही वह ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई है। 26 मार्च को शादी रचाने के बाद अब शिवपुर करण छपरा पंचायत में चुनावी मैदान पूरी तरह से सच चुका है। हाथी सिंह ने कहा कि वे पिछले 5 वर्ष से प्रधान पद का चुनाव जीतने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं और उनके समर्थक भी प्रचार में जुटे हुए हैं। उन्होंने कहा कि मैंने जीवन में कभी शादी नहीं करने का फैसला किया था। लेकिन अपने समर्थकों के कारण वह फैसला बदलना पड़ा। मेरी मां 80 साल की है और वह चुनाव नहीं लड़ सकती थी। इस कारण भी शादी करने का फैसला लिया। अब निर्णय करना समाज के हाथों में है।
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