(कर्ण हिन्दुस्तानी )
आखिरकार सबको साथ लेकर चलने की बात करने वाले मोदी जी की सत्ता ने फिर एक बार दस्तक दी है। मोदी विरोधियों को यह दस्तक किसी धोबी पिछाड़ से कम नहीं लग रही है। दक्षिण से लेकर उत्तर तक सभी विरोधी दल के नेता देश की तरक्की के लिए आपस में नहीं मिल रहे थे बल्कि प्रधानमंत्री पद को लेकर बंदर बाँट कैसे की जाए इसके लिए यह मुलाकातें हो रहीं थीं। यदि विरोधी दलों को देश के भविष्य की चिंता होती तो सभी मिलकर देश हित की बात करते। मगर ऐसा नहीं हुआ।
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आज की तारीख में अगर कहा जाए कि विपक्ष को आम जनता की नब्ज़ का पता ही नहीं है , तो यह बात गलत नहीं होगी। विपक्ष मोदी का विरोध करना ही अपना राजनीतिक धर्म समझता रहा और जनता इन विपक्षियों के मंसूबों को अच्छी तरह से समझती रही। २०१४ में जब मोदी जी पहली बार सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे उस वक़्त भी कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने अपने कार्यकाल के कार्यों की समीक्षा जनता के सामने रखने के बजाए मोदी को बदनाम करने की रणनीति बनाई और मुँह के बल गिरे।
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अब २०१९ में चुनाव प्रचार के दौरान भी विपक्ष ने जिस तरह से मोदी और उनकी निजी ज़िंदगी पर प्रहार किया वह ही विपक्ष के लिए घातक साबित हुआ और महागठबंधन को डुबाने में भी मोदी विरोध ही मुख्य रहा। माया ममता अखिलेश सभी ने मोदी की जाति निकाली , उनकी माँ को लेकर भी प्रश्न उठाए , उनकी निजी ज़िंदगी में भी विपक्ष ने ताकने की कोशिश की। मगर मोदी ने जस की तस भाषा का अगर इस्तेमाल भी किया तो संयम से किया। ऐसा नहीं कि मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान मर्यादा नहीं तोड़ी मगर विपक्ष की तरह बेसिर पैर के इलज़ाम भी नहीं लगाए। जनता जनार्दन ने जिस तरह से मोदी युग की शुरुआत की है वह अद्वितीय है , आश्चर्यजनक है।
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भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में किसी गैर कांग्रेसी सरकार का दुसरी बार पूर्ण बहुमत से आना एक इतिहास रचने के सामान है। इस इतिहास को बनाने में मोदी जी का सबका साथ – सबका विकास का नारा ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। जाति – धर्म की राजनीती से ऊपर उठ कर सर्वांगीण विकास करना किसी सरकार ध्येय बन जाए तो उसे दुबारा आने से कोई नहीं रोक सकता और यही बात है कि जनता ने फिर एक बार मोदी जी को मौक़ा दिया है।
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