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रेलवे कालोनीया बन गई है, माफियाओं का अड्डा

रेलवे में जहां इकनॉमी के नाम पर लगातार रेलवे कर्मचारी कम किए जा रहे हैं यह बात और है कि रेलवे कर्मचारियों की वजह से नहीं बल्कि रेलवे के प्लानरो की वजह से रेलवे का बेड़ा गर्क हो रहा है) वहीं रेलवे के मिसमैनेजमेंट की वजह से या यूं कहें कि अंदर ही अंदर पक रही कुछ और खिचड़ी की वजह से आज मुंबई मंडल में करीब 650 से ऊपर रेलवे आवास खाली पड़े हैं। यदि एक आवास का किराया सामान्यतः पन्द्रह हजार रुपये प्रतिमाह भी लगाएं तो करीब प्रति माह करीब एक करोड़ का नुकसान केवल मुंबई मंडल में सीधे-सीधे हो रहा है,

तथा परोक्ष रूप से देखें तो प्रतिदिन इन खाली पड़े आवासों के सामान जैसे खिड़की, दरवाजे, नल, इलेक्ट्रिकल फिटिंगस आदि चोरी हो रही है,जिसे फिर से आवास आवंटन के बाद दुरुस्त करके देना रेलवे के बस में नहीं रहता, क्योंकि एस्केलेटर लगाने के लिए सरप्लस फंड है पर रेलवे आवासों में नल लगाने के लिए रेलवे के पास पैसा नहीं होता है। यानी यह अरबों रुपए के आवास अब भविष्य में नो डिमांड के तहत नष्ट कर दिए जाएंगे। इसका भी ठीकरा कर्मचारी के ही सिर फोड़ा जाएगा।

आज रेलवे कॉलोनियाँ किसी स्लम से अधिक नहीं बची हैं। करोड़ों रुपए मेंटेनेंस के नाम पर निकल रहे हैं पर जा कहां रहे हैं यह कोई नहीं जानता। रेलवे आवासों के आसपास गर्मी में भी गटर भरे पड़े हैं जिनमें सूअर आराम फरमा रहे हैं। आज अनेकों जगह ऐसी है जहां कर्मचारी हाउस रेंट लेकर उससे भी सस्ते किराए में सुंदर प्राइवेट कॉलोनी में रह सकता है पर फिर भी वह खस्ताहाल रेलवे आवास में रहना चाहता है क्योंकि यह उसे अपना लगता है। पर रेलवे को दीमक की तरह चाट रहे एक वर्ग को यह सब पसंद नहीं। वह आवासों को छोटी-छोटी मरम्मत कर दुरुस्त रखने की बजाय उन जख्मों को पहले नासूर बनाता है, फिर भी जी नहीं भरता, तो कर्मचारियों से जबरदस्ती खाली करवाता है।

फिर उसको अपने ही लोगों के इशारे पर असामाजिक तत्वों द्वारा भरपूर लूटने के लिए महीनों – सालों खाली छोड़ देता है। इस बीच वे रेलवे आवास असामाजिक तत्वों की पनाह बनते हैं जिनमें खुलेआम जुआ, शराब, ड्रग्स का व्यापार तथा वेश्यावृत्ति की जाती है । स्थाई तौर पर उन आवासों पर अलग-अलग किस्म के माफिया का कब्जा होता है यह सब को दिखता है पर रेलवे को नजर नहीं आता। जब रेलवे देख लेती है कि यह बिल्डिंग या आवास लाइलाज हो गया है तो उस अत्यंत मजबूत बिल्डिंग को जो कि थोड़े-थोड़े मेंटेनेंस से वर्षों तक रहने योग्य बनी रहती को षड्यंत्र कर एकदम बेकार (कंडम) कर उसे तोड़ देते हैं।

यदि इस बीच यूनियन या कर्मचारियों ने हल्ला मचाया तो चुन चुन कर वही आवास कर्मचारियों को आवंटित करते हैं जिन पर माफिया का व्यापार चल रहा होता है जब कर्मचारी उस टूटे मकान का भी पजेशन लेकर खुशी-खुशी यह सोचकर जाता है कि मेरे परिवार को खुद का आशियाना तो मिला चाहे वह कैसा ही हो तो वहां कब्जा किए माफिया द्वारा उसको ऐसी दम दी जाती है कि वह बेचारा जान बचाकर भागता है। अब उसने यदि आवास लेने से मना कर दिया तो उस कर्मचारी को 1 वर्ष तक आवास आवंटन पर रोक लगा दी जाती है । और उस आवास को नो डिमांड में या कंडम बता कर नष्ट कर दिया जाता है, या इसी तरह माफिया के भरोसे छोड़ दिया जाता है ।

और यदि उस रेलकर्मी ने किसी भी तरह उस आवास में रहना चालू किया तो उस कर्मी को महा बेशर्म मानकर फंड ना होने की बात कहकर उसमें सुधार करने को मना कर उसके परिवार को असुरक्षित अवस्था में भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है । इस उम्मीद के साथ कि यह कभी तो यहां से भागेगा। सी आर एम एस के प्रतिनिधि ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया की यदि उपरोक्त कथन गलत है, तो मान्यता प्राप्त यूनियनों के प्रति निधियों के साथ कल्याण की रेलवे कालोनियों में रेलवे के शीर्ष अधिकारी, महाराष्ट्र पुलिस कमिश्नर , और अन्य बाहरी जिम्मेदार अधिकारियों तथा संस्थाओं के साथ विजिट करें और वास्तविक स्थिति अपनी आंखों से देखें।

ऐसा केवल कल्याण में ही नहीं है यह मंजर हर रेलवे कॉलोनी का बनाया जा रहा है। अशोक नगर में मान्यता प्राप्त यूनियनों के बिना सलाह के बनाई गई अनेको बिल्डिंग है। ये जब से बनी हैं अपनी जिंदगी मौत के बीच जूझते जूझते 20 25 सालों में ही कालकवलित हो गई, वहां अनेकों प्रकार के माफियाओं का कब्जा हो गया सैकड़ों करोड़ की रेलवे भूमि पर अवैध कॉलोनी बनी हुई है, रेलवे परिसर में माफिया का आतंक मचा है। क्या कोई शांतिप्रिय रेलकर्मी जो दिन रात की ड्यूटी करने वाला हो अपने परिवार को इस असुरक्षा की स्थिति में छोड़कर एकाग्र चित्त हो संरक्षा का ध्यान रख अपनी नौकरी कर सकता है?

रेलवे कालोनियों में वैसे ही शहर की पुलिस का ध्यान नहीं जाता है, इसी वजह से वहां रहने वाले रेलकर्मी असुरक्षा की भावना से ग्रसित रहते हैं। यदि कोई हादसा इस परिसर में होता है तो उसका निर्णयात्मक हल कभी निकलता ही नहीं , इस बात को असामाजिक तत्व भली-भांति जानते हैं। इसीलिए रेलवे कॉलोनियाँ उनके लिए सुरक्षा की दृष्टि से वरदान साबित होती हैं। इस बात को गंभीरता से लेना अत्यावश्यक है। कल्याण में कितनी बिल्डिंग आज से 10 – 12 साल पूर्व कन्वर्शन के नाम पर बना तो ली पर आज तक कंप्लीट नहीं हुई, ना ही किसी कर्मी को अलाट की गई। वर्तमान में वे सभी असामाजिक तत्वों के कब्जे में है। वहां धड़ल्ले से हर अवांछित कार्य किए जा रहे हैं । इस हेतु संबंधित अधिकारी को दोषी मानते हुए उन पर कार्यवाही करनी चाहिए ।

कल्याण पश्चिम में करीब 48 से 60 क्वार्टरों की कॉलोनी जिसे ब्रेक्समैन चाल कहते हैं की सबसे प्राइम लोकेशन की सैकड़ों करोड़ की जगह वर्षों से खाली पड़ी है जिस पर हर तरह की राजनीतिक पार्टी का कार्यालय, जुआ घर तथा देह व्यापार चलता है। बरसों से सी आर एम एस ने प्रशासन के संज्ञान में ही नहीं लाया बल्कि अधिकारियों का भ्रमण भी करवा चुकी है, पर एक दो साल में कभी तंद्रा टूटती है तब उस ओर ध्यान जाता है पर आज तक उसका कोई ठोस निर्णयात्मक हल नहीं मिला।

जबकि रेलवे प्रशासन चाहे तो वहां गगनचुंबी रेलवे आवास, व्यापारिक संस्थान, अधिकारी निवास या मंडल के अनेकों कार्यालय बनाए जा सकते हैं। पर इस ओर इतनी उदासीनता संदेह पैदा करती है। रेल आवासों की दिन-प्रतिदिन होती जा रही दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है ? संबंधित विभाग पर इसका दोष क्यों नहीं आरोपित किया जाता है? लगातार लीकेज के कारण स्ट्रक्चर खराब हो रहे हैं, सनशेड गिरने की कितनी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, सीवर लाइनें ब्लॉक पड़ी है, खिड़की दरवाजे अपनी अंतिम सांस ले रहे हैं, कहीं पार्किंग का प्रबंध नहीं है, डाउनटेक पाइप वर्षों तक फूटे रहने से सारी दीवारें गल रही है, चारों ओर गटर भरी पड़ी है , सूअर आराम फरमा रहे हैं,

कॉलोनी की कोई बाउंड्री ना होने से बाहरी लोग बे खटके आते जाते हैं तथा चोरी आदि को अंजाम देते हैं। बाहर के व्हीकल स्थाई तौर पर कॉलोनी में पार्क किए जाते हैं। आखिर इसके पीछे क्या प्रशासनिक सोच चल रही है समझ में नहीं आता! या तो रेलवे इन सब को सही तरह से दुरुस्त करें, नहीं तो रेलकर्मी से प्राप्त होने वाले हाउस रेंट से वहां रहने वालों को ही उन आवासों या बिल्डिंगों की मरम्मत करवाने की स्वीकृति दे दी जाए। आप देखिए देखते-देखते कालोनियों की दशा सुधरने लगेगी जब तक हम रेलवे आवासों, रेलवे कार्यालयों, कार्य स्थलों की दुर्दशा पर ध्यान नहीं देंगे तब तक दक्षता पूर्ण कार्य की उम्मीद भी करना व्यर्थ है।

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