(कर्ण हिंदुस्तानी )
पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र की राजनीती में जो उबाल आया हुआ है वह ना तो बीजेपी को और ना ही शिवसेना को समझ में आ रहा है। दोनों दलों के नेतागण आपस में मौखिक और दैहिक जंग करने में लगे हुए हैं।
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बीजेपी के किरीट सोमैय्या (जिनका राज्य की तरक्की में योगदान तिल मात्र भी नहीं है ) रोज ही तथाकथित सबूत लेकर बवाल कर रहे हैं।
शिवसेना के संजय राउत भी रोज ही कमर के नीचे बयान बाज़ी कर रहे हैं। इसी में हिन्दू धर्म और हमारे देवी देवताओं को भी निशाना बनाया जा रहा है। कभी हनुमान चालीसा तो कभी कुछ और लेकर दोनों दल भिड़े हुए हैं। शरद पवार जैसा घाघ (? )
नेता भी इसमें अपनी राजनीती चमकाने में लगा है और कांग्रेस के नेतागण अपनी मैडम के इशारे पर सारा तमाशा देख रहे हैं। हिन्दुओं को आपस में लड़ाने का कांग्रेस का मकसद पूरा हो रहा है। मगर यह बात किसी को भी समझ नहीं आ रही है। शिवसेना और बीजेपी दोनों ही एक दूसरे पर सत्ता के लालची होने का आरोप लगा रहे हैं।
जबकि सच्चाई यह है कि दोनों दलों को सत्ता चाहिए। जो मातोश्री अब तक किंग मेकर बनी हुई थी वह खुद किंग बनकर मैदान में है। तीन साल की मौजूदा सरकार में ढाई साल तक मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे स्वास्थ्य कारणों से कई महत्वपूर्ण बैठकों से नदारद रहे हैं। जिसका फायदा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस बखूबी उठा रही है।
शिवसेना की तरफ से संजय राउत जैसा व्यक्ति है , जिसे सिर्फ और सिर्फ हंगामा खड़ा करने में महारत हासिल है। बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी राउत की तरह ही भाषण बाज़ी कर रहे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक दूसरे की इज़्ज़त उछालने में लगे हैं।
दोनों दलों ने दूसरे की पोल खोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बीजेपी ने जहां राज्य के गृहमंत्री रह चुके अनिल देशमुख की कथित काली कमाई को मुद्दा बनाया और बाद में नवाब मलिक के दाऊद के साथ कथित संबंधों को मुद्दा बनाकर हंगामा किया। वहीँ शिवसेना ने किरीट सोमैय्या और दरेकर को निशाना बनाया हुआ है।
इसमें राणा दंपत्ति ने कूदकर धार्मिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की। यही राणा दंपत्ति यदि यह कहते कि वह मुंबई के किसी भी हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा पढ़ेंगे तो बात अलग होती। लेकिन मातोश्री के बाहर हनुमान चालीसा पढ़ने की जिद्द करना कहाँ तक उचित है। जिन स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे का जिक्र राणा दंपत्ति करते हैं , उन बाला साहेब ने भी कहा था कि धार्मिक प्रार्थना अपने अपने घरों में होनी चाहिए।
ऐसे में यह सब नौटंकी क्यों हो रही है ? इस वक़्त महाराष्ट्र को विकास की तरफ देखना चाहिए। ना कि हनुमान चालीसा और मस्जिद में लगे ध्वनिप्रक्षेपण की तरफ। मनसे के सर्वेसर्वा राज ठाकरे की बात करें तो गुढी पाड़वा वाले दिन उन्होंने जो भी मुद्दे उठाए वह कानून के दायरे में थे।
कई जगह मस्जिदों में अजान के बाद मुस्लिम धर्मगुरु एक एक घंटा उत्तेजित भाषण देते हैं। जिससे अन्य लोगों को तकलीफ होती है। मेरा स्पष्ट मत है कि धार्मिक विधि अपने घरों में और अपने धार्मिक स्थलों में होनी चाहिए। जिस धार्मिक विधि से किसी को तकलीफ हो ऐसी विधि कोई फल नहीं देती। राजनीती में करनी और कथनी में काफी अंतर होता है।
यदि बीजेपी को यह लगता है कि शिवसेना गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया है तो वह महाविकास अघाड़ी के गठन के बाद ही चुनाव आयोग अथवा अदालत में गुहार लगा सकती थी। मगर खुद बीजेपी ने अजीत पवार के साथ राजनीतिक मंडप सजाया था।
फिर शिवसेना को दोष कैसे दिया जा सकता है ? दोनों दल हिंदुत्ववादी होने का दम भरते है और आज की तारीख में दोनों दलों की वजह से हिंदुत्व बदनाम हुआ है और हमारे देवी देवताओं का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह सब पिछले दरवाजे से कांग्रेस का ही खेल है। इसको समझना ज़रूरी है।
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