महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव २०१९, भाजपा का गर्वहरण
(कर्ण हिन्दुस्तानी )
आज विधानसभा चुनावों के नतीजे आ गए और बीजेपी को उसके गर्वहरण का भी एहसास हो गया होगा। पार्टी के लिए यह नतीजे ना रोया जाए , ना हंसा जाए की हालत करने वाला है। २०१४ में जब बीजेपी शिवसेना का गठबंधन नहीं था तब बीजेपी ने २६० सीटों पर चुनाव लड़कर १२२ सीटों पर विजय हासिल की थी। इस बार शिवसेना से गठबंधन कर सौ का आंकड़ा भी मुश्किल से हासिल करने की नौबत आ गई है। इसका जिम्मेदार कौन है ? यह सवाल अब आम कार्यकर्ता पूछने लगा है।
आज विधानसभा चुनावों के नतीजे आ गए और बीजेपी को उसके गर्वहरण का भी एहसास हो गया होगा। पार्टी के लिए यह नतीजे ना रोया जाए , ना हंसा जाए की हालत करने वाला है। २०१४ में जब बीजेपी शिवसेना का गठबंधन नहीं था तब बीजेपी ने २६० सीटों पर चुनाव लड़कर १२२ सीटों पर विजय हासिल की थी। इस बार शिवसेना से गठबंधन कर सौ का आंकड़ा भी मुश्किल से हासिल करने की नौबत आ गई है। इसका जिम्मेदार कौन है ? यह सवाल अब आम कार्यकर्ता पूछने लगा है।
बीजेपी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर बाहरी उम्मीदवारों को टिकिट देना। जबरन गठबंधन कर मौजूदा विधायकों का टिकिट काट कर शिवसेना झोली में डालना क्या पराजय की वजह नहीं है ?
मोदी – शाह की जोड़ी को आगे कर चुनाव जीतने की गलत फेहमी जो बीजेपी में पनपने लगी है वह बीजेपी के भविष्य के लिए खतरनाक है। राष्ट्रिय मुद्दों को आगे कर स्थानीय मुद्दों को नकारना आखिर कब तक चलेगा ? महाराष्ट्र की जनता की जरूरतों को दरकिनार कर आयाराम को महत्व देने वाले महाराष्ट्र के बीजेपी पदाधिकारियों को अब आत्मचिंतन करने की नितांत जरूरत है। अपने ही वरिष्ठ नेताओं को टिकिट नकार कर दूसरे दलों से आये लोगों को टिकिट देकर आखिर बीजेपी का नेतृत्व साबित क्या करना चाह रहा था ?
मोदी – शाह की जोड़ी को आगे कर चुनाव जीतने की गलत फेहमी जो बीजेपी में पनपने लगी है वह बीजेपी के भविष्य के लिए खतरनाक है। राष्ट्रिय मुद्दों को आगे कर स्थानीय मुद्दों को नकारना आखिर कब तक चलेगा ? महाराष्ट्र की जनता की जरूरतों को दरकिनार कर आयाराम को महत्व देने वाले महाराष्ट्र के बीजेपी पदाधिकारियों को अब आत्मचिंतन करने की नितांत जरूरत है। अपने ही वरिष्ठ नेताओं को टिकिट नकार कर दूसरे दलों से आये लोगों को टिकिट देकर आखिर बीजेपी का नेतृत्व साबित क्या करना चाह रहा था ?
जिन बाहरी लोगों को टिकिट दिया गया उनमें से कितने जीत कर आये हैं , इसका विश्लेषण होने का वक़्त आ गया है। बीजेपी में अगर इस बार बड़े पैमाने पर बगावत का बिगुल बजा है तो उसके लिए बीजेपी का नेतृत्व ही जिम्मेदार है। ऐसे पदाधिकारियों पर केंद्रीय नेतृत्व क्या कार्रवाई करता है यह देखना भी जरूरी है। अभी कई जगहों के स्पष्ट नतीजे आने बाकी हैं। मगर खुद के बल पर १४७ सीटें लाने की बात करने वाली बीजेपी को मतदाताओं ने उसकी औकात बता दी है। यदि अब भी बीजेपी का प्रदेश नेतृत्व आत्मचिंतन नहीं करता है तो भविष्य ठीक नजर नहीं आता है।

