पितृपक्ष मे श्राध्द का महत्व – प्रेम चौबे
*माता -पिता की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा हैं*
हिंदू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना जाता हैं।इसलिए हमारे धर्मशास्त्रो मे पितरों का उध्दार करने के लिए पुत्रों की अनिवार्यता मानी गयी है।अपने माता -पिता व पूर्वजों को मृत्युके पश्चात भूल न जाऐ इसलिए श्राध्द करने का विधान बताया गया हैं।
हिंदू शास्त्रों के अनुसार जिसका जन्म होता हैं,उसकी मृत्यु तय हैं, उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हो गयी हैं,उसका जन्म निश्चित है। कहने का तात्पर्य हैं कि, आवागमन की दुनिया मे समस्त प्राणी मात्र ईश्वर के अधीन चलने वाली सृष्टि का एक हिस्सा हैं।
*कर्मानुसार होती हैं मोक्ष और नर्क की प्राप्ति*
मृत्यु उपरांत कुछ लोगो को उनके अच्छे कर्मानुसार मोक्ष की प्राप्ति हो जाती हैं,तो कुछ लोगों को पितृदोष या फिर अन्य कर्मो के अनुसार तमाम योनियों मे भ्रमण करना पड़ता हैं, यदि अकाल मृत्यु हुई हो तो प्रेतयोनि की प्राप्ति हो जाती हैं, जिस कारण मृतआत्माओं को मृत्युलोक मे ही भ्रमण करना पड़ता है।
भारतीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तीन ऋण मनुष्यों के ऊपर बताऐ गये हैं, पितृऋण,देवऋण तथा ऋषिऋण इनमें पितृऋण को सर्वोपरि बताया गया हैं। इस ऋण मे पिता के अतिरिक्त माता तथा उन पितरों का समावेश हैं,जिन्होंने हमे जीवन मे प्राण डालने तथा उसका विकास करने मे सहयोग दिया।
भगवान श्री कृष्ण ने गीता मे कर्म को सर्वोपरि बताया हैं, मनुष्य आचरण और कर्म के अनुसार मोक्ष,स्वर्ग,नर्क के दरवाजे तक पहुँचता हैं। मनुष्य को भाग्यवादी न बनकर कर्मवादी बनना श्रेयस्कर और उत्तम प्रवृत्ति हैं, अच्छे कर्म सात्विक आचरण के द्वारा ही मनुष्य इस जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाता हैं। गीता मे श्रीकृष्ण ने 20 आचरणों की चर्चा की है। जिससे मनुष गीता पाठ कर भक्ति भाव से मानवता के सुमार्ग पर चल सकते है।
*कौन से महिनें मे पितृपक्ष का योग आता हैं*
हिंदी महिनों के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक की सोलह दिनो की अवधि को पितृपक्ष कहते हैं।शास्त्रोंनुसार पितृपक्ष मे अपने पितरों के लिए श्रध्दानुरूप यथाशक्ति शास्त्रविधि से श्राद्ध करता हैं,उसके घर परिवार मे सकल मनोरथ सिध्द होते हैं,तथा रोजगार व्यवसाय मे उन्नति होती है। उचित ढंग से श्राध्द कर्म न करने तथा अपने पितरों को पितृपक्ष मे जल तर्पण व वार्षिक श्राध्द न करने से परिवार मे पितृदोष लग सकता हैं।
इसके फलस्वरूप परिवार मे कलह,अशांति,वंशवृद्धि मे रूकावटें, बिमारी आदि का सामना करना पड़ता है। यदि परिवार मे किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो, तो शास्त्रीय विधि के अनुसार उनकी आत्मशांति के लिए किसी पवित्र तीर्थस्थान पर श्राध्द कर्म करवाएं घर मे मातृ- पितृ की सेवा सम्मान श्रध्दापूर्वक करनी चाहिए।
प्रतिवर्ष पितरों को जल तर्पण अवश्य करें प्रतिवर्ष पंद्रह दिनों का पितृपक्ष के विधान को श्रध्दापूर्वक हर पुत्र को निभाना चाहिए ध्यान रहे जो सम्मान हम अपने पूर्वजों को देंगे उसका अनुसरण हमारे वंशज करेंगे इसलिए अध्यात्म से शांति की प्राप्ति होती हैं।
*कैसे करे पितृपक्ष मे पिंडदान*
बह्मवैवत पुराण के अनुसार पितृपक्ष में श्राध्दकर्म के रूप में पिंडदानतर्पण और ब्राह्मण भोजन तीन मुख्य कार्य का प्रावधान बताया गया हैं। किसी नदी के तट अथवा जलाशय के की ओर मुख करके आचमन करें एवं अपने जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर दूध, शक्कर, चावल, घी ,शहद, काला तिल मिलाकर पिंडो का निर्माण कर श्रध्दापूर्वक पिंडदान करना चाहिए।
यह सारे कर्म परिवार मे बड़े पुत्र के द्वारा किया जाता हैं। पितृपक्ष मे दोपहर ग्यारह बजे से बारह बजे के बीच कुपत बेला मे स्नानकर जल तर्पण करके पितरों का स्मरण करना चाहिए, कुपत बेला मे कुश और काले तिल के साथ जल तर्पण करना अद्भुत परिणाम देता हैं।
*पितृपक्ष मे कौओं का महत्व*
हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार यह मान्यता हैं, पितृपक्ष मे पितर कौवे के रूप मे धरती पर आते हैं। शास्त्रों मे वर्णित हैं कि देवताओं के साथ कौओं ने भी अमृतपान किया था, जिसके बाद से यह सुना और देखा भी गया हैं, कौओं की कभी भी प्राकृतिक मृत्यु नहीं होती हैं।
तथा पितृपक्ष मे घर दरवाजे पर आऐ किसी प्राणी को बीना भोजन कराए वापस न करने का विधान भी हैं। इस क्रम मे पशु पक्षी भी शामिल हैं। तथा कौवों (मादा) को इस महिने मे सबसे ज्यादा पौष्टिक पदार्थों की आवश्यकता होती हैं ।कारण इस मास मे वो अंडे देती हैं, तथा नये कौओं का जन्म भी इसी महिने मे होता हैं,
इन कौवों के द्वारा ही प्रकृति मे विशालकाय वृक्ष पीपल और बरगद का बीजारोपण होता हैं। पीपल और बरगद के पेड़ को अक्सर कोई रोपता नही ना, ही उसकी कलम लगाई जाती हैं। उनके फलों को कौओं द्वारा खाने (निगलने) से उनके पेट मे ही इन बीजों का विकसित होकर इनके मल के द्वारा धरती पर ऐ वृक्ष असतित्व मे आते है,
ऐ प्रकृति मे ऐसे जीवनदायी वृक्ष हैं और अन्य वृक्षों (आक्सीजन लेकर, कार्बनडाइऑक्साइड छोड़ने )के मुकाबले आक्सीजन लेने के साथ आक्सीजन छोड़़ते भी है।

