FEATURED

भक्तों की रक्षा का संदेश देता है होलिका दहन

(शीतला प्रसाद सरोज)
होलिका दहन का पर्व संदेश देता है कि ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं। होलिका दहन, होली त्योहार का पहला दिन, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।

इसके अगले दिन रंगों से खेलने की परंपरा है, जिसे धुलेंडी, धुलंडी और धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है। होली बुराई पर अच्छाई की जीत के उपलक्ष्य में मनाई जाती है।

होलिका दहन को छोटी होली भी कहते हैं। इसके अगले दिन हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है,जिसके तहत अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर लोग खुशियों का इजहार करते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार हिरण्याकश्यप की बहन होलिका को वरदान था कि वह जल नहीं सकती, जिसका फायदा उसका भाई हिरण्याकश्यप उठाना चाहता था। सत्य के प्रतीक अपने बेटे प्रह्लाद को राम नाम अर्थात सत्य के मार्ग पर से चलने से वह रोकना चाहता था।

तरह-तरह के अवरोध कर जब वह हार गया तो वह बहन होलिका को आदेश दिया कि वह लकड़ी के ढेर पर प्रह्लाद को लेकर बैठ जाए,जिसमें आग लगाई जायेगी और ऐसा ही किया गया। लेकिन प्रभु की कृपा से आग से होलिका तो जल गयी मगर प्रह्लाद बच गया।

कामदेव की कथा-
होली की कथा कहानी कामदेव से भी संबंधित है। कथा के अनुसार पार्वती जी भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं लेकिन तपस्या में लीन शिव का ध्यान उनकी तरफ गया ही नहीं। ऐसे में प्यार के देवता कामदेव आगे आए और उन्होंने शिव पर पुष्प बाण चला दिया।

तपस्या भंग होने से शिव को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी और उनके क्रोध की अग्नि में कामदेव भस्म हो गए। कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति रोने लगीं और शिव से कामदेव को जीवित करने की गुहार लगाई।

अगले दिन शिव का क्रोध शांत हो चुका था, उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित किया। कामदेव के भस्म होने के दिन होलिका जलाई जाती है और उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार मनाया जाता है।

महाभारत की कहानी-
महाभारत की एक कहानी के मुताबिक युधिष्ठर को श्री कृष्ण ने बताया कि एक बार श्री राम के एक पूर्वज रघु, के शासन में एक असुर महिला थी। उसे कोई भी नहीं मार सकता था, क्योंकि वह एक वरदान द्वारा संरक्षित थी।

उसे गली में खेल रहे बच्चों के अलावा किसी से भी डर नहीं था। एक दिन, गुरु वशिष्ठ, ने बताया कि उसे मारा जा सकता है, यदि बच्चे अपने हाथों में लकड़ी के छोटे टुकड़े लेकर, शहर के बाहरी इलाके के पास चले जाएं और सूखी घास के साथ-साथ उनका ढेर लगाकर जला दें।

फिर उसके चारों ओर परिक्रमा करें। नृत्य करें। ताली बजाएं। गाना गाएं और नगाड़े बजाएं। बच्चों ने ऐसा ही किया,जिससे असुर महिला थी की मृत्यु हुई। इस दिन को एक उत्सव के रूप में मनाया गया, जो बुराई पर एक मासूम दिल की जीत का प्रतीक है।
श्रीकृष्ण और पूतना की कहानी-
होली का श्रीकृष्ण से गहरा रिश्ता है। जहां इस त्योहार को राधा-कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।

वहीं, पौराणिक कथा के अनुसार जब कंस को श्रीकृष्ण के गोकुल में होने का पता चला तो उसने पूतना नामक राक्षसी को गोकुल में जन्म लेने वाले हर बच्चे को मारने के लिए भेजा। पूतना को स्तनपान के बहाने शिशुओं को विषपान कराना था। लेकिन कृष्ण उसकी सच्चाई को समझ गए।

उन्होंने दुग्धपान करते समय ही पूतना का वध कर दिया। कहा जाता है कि तभी से होली पर्व मनाने की मान्यता शुरू हुई।

इन कथाओं का सार है कि सत्य मार्ग पर चलने वाला परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। आज हमें भी ऐसी ही पैराणिक कथा और कहानियों प्रेरणा लेकर उनका अनुशरण करते हुए अपने सत्यधर्म,कर्तब्य से विचलित नहीं होना है । ईश्वर सत्य और धर्म का साथ देता है। सत्य की विजय होती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *