(कर्ण हिन्दुस्तानी )
लोकसभा चुनावों के चार चरण बीत चुकें हैं , मात्र तीन चरण बाकी हैं। लगभग सत्तर फीसदी मतदान सम्पन्न हो चुका है। वोटिंग मशीनों में नेताओं का भाग्य बंद हो चुका है। ऐसे में यदि विश्लेषण किया जाए तो यह चुनाव अपने आप में बेहद निचले स्तर का चुनाव रहा है। यहां तक कि देश की सर्वोच्च अदालत को भी नेताओं की बदज़ुबानी पर लगाने की नौबत आ गई।
मगर सवाल यह उठता है कि देश के भविष्य का क्या ? क्या लोकतंत्र का महापर्व गालियों और बेतुके आरोपों का पर्व बन कर रह जाएगा ? देश की संसद में यह सभी एक दूसरे से आँख कैसे मिलाएंगे ? देश के प्रधानमंत्री को अपरोक्ष रूप से चोर कहना , हर बात पर फेकू शब्द का प्रयोग करना , भगोड़े आर्थिक अपराधियों को लेकर प्रधानमंत्री को कोसना कहाँ तक उचित है ?
जबकि सभी जानते हैं कि आर्थिक भगोड़ों को अपनी गिरफ्तारी का भय सताने लगा था और यही वजह थी कि विजय माल्या , नीरव मोदी और तमाम आर्थिक घपले बाज़ भाग खड़े हुए। इन सभी को कांग्रेस के राज में क़र्ज़ पर क़र्ज़ देकर मौज करवाई जा रही थी। जनता के कर को इन पूंजीपतियों के दरबार में लुटाया जा रहा था।
२०१४ के बाद इन सभी घटालों पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया शुरू हुई और माल्या तथा नीरव मोदी जैसे लोग पलायन करने को मज़बूर हुए। देश को तरक्की देने की शुरुवात हुई। मगर आजतक देश पर शासन करने वालों को यह मंज़ूर नहीं था। उनकी नज़र में पूंजीपति देश के बैंकों पर अपना मालिकाना हक़ रखते हैं और जब भी वह चाहें घाटा दिखाकर बंकों से मोटी रकम क़र्ज़ के रूप में उठा सकतें हैं। विदेशी कंपनियों को भी भारत में खुली छूट दी गई।
देश का युवा अपने व्यवसाय को आगे ना बढ़ा सके इसके लिए जब भी युवाओं ने खुद व्यवसाय शुरू करने के लिए बैंकों में क़र्ज़ के लिए आवेदन दिया तब तब इतनी शर्तें लाद दी गयीं कि देश का युवा वर्ग मालिक बनने का स्वप्न भी ना देख पाए और मज़बूरन वह भारत में पैर पसार चुकीं विदेशी कंपनियों में नौकर के रूप में काम करने को मज़बूर हो जाए।
आज २०१४ के बाद मुद्रा योजना के अंतर्गत लाखों युवकों ने खुद का व्यवसाय शुरू किया हुआ है। इस पर भी विपक्ष चिल्लाता है कि नौकरियां कम हुई हैं। मगर विपक्ष यह क्यों मान्य नहीं करता कि खुद का रोज़गार करने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है। देश को तरक्की देने के अवसर शुरू हुए हैं , कर दाताओं का सम्मान पहली बार हुआ है। विपक्ष को अपनी गिरेबान में झांकना होगा। यदि ऐसा नहीं होगा तो २०१९ का लोकसभा चुनाव बेतुके आरोपों के लिए ही याद रखा जाएगा।
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