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भोजपुरी फिल्में आगाज़ से अंत की ओर   (भाग – १ )

डी. यादव )
किसी ज़माने में भोजपुरी फिल्मों को आस्था की दृष्टी से देखा जाता था।  गंगा मैय्या तोहे पियरी चढ़ैईबो (१९६३ ) भोजपुरी की पहली फिल्म थी। इस फिल्म ने अपने  समय में काफी नाम कमाया था। उत्तर भारत की जनता ने इस फिल्म को हाथों हाथ लिया और एक  अध्याय  शुरुवात हुई। दरअसल १९६० में जब तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी ने बिहार का दौरा किया और उनकी वहाँ प्रख्यात फिल्म कलाकार नाज़िर हुसैन से मुलाक़ात हुई।  नज़ीर हुसैन को डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने भोजपुरी भाषा में फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया।
राजेंद्र प्रसाद जी की बात को मानते हुए नाज़िर  हुसैन ने   गंगा मैय्या तोहे पियरी चढ़ैईबो बनाई।  इस फिल्म को विश्वनाथ शाहाबादी ने रिलीज़ किया था।  बिटिया भईल सयान , चंदवा के ताके चकोर , हमार भौजी , गंगा किनारे मोरा गाँव और सम्पूर्ण तीर्थ यात्रा जैसी फिल्में  बनीं और लगभग अच्छा व्यवसाय भी किया। इसके बाद समय बीता और भोजपुरी  व्यवसाय कम होता गया।इसके पश्चात राकेश पांडेय ने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को फिर से नए आयाम पर पहुंचाया। यह वक़्त १९७७-७८ का था।
फिर आया  १९८० का साल इस साल में भोजपुरी फिल्मों को कुणाल सिंह जैसा लम्बी कद काठी वाला नायक मिला।  जिसकी फिल्म बलम परदेसिया ने धूम मचा दी।लागि नहीं छूटे राम और   भोजपुरी की गंगा किनारे मोरा  गाँव  ने तो रिकॉर्ड कायम करते हुए मुंबई के मिनर्वा सिनेमागृह में   एक साल चार माह तक रिकॉर्ड कमाई की।   इसके बाद २००३ में भोजपुरी भाषा के भजन और लोकगीत  गायक मनोज तिवारी ने फिल्म कन्यादान में एक अतिथि कलाकार के रूप में रुपहले पर्दे पर पहला कदम रखा। जबकि इसी फिल्म में भोजपुरी फिल्मों के हिट नायक कुणाल सिंह पहली बार चरित्र कलाकार के रूप में नज़र आये।
इसके पश्चात मनोज तिवारी और रवि किशन नामक दो नव जवान कलाकार भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्रीज़ को मिले, कई फिल्में साइन की गयीं।  मगर मनोज तिवारी की  भोजपुरी फिल्म आयी ससुरा बड़ा पैसा वाला ने करोड़ों रूपये की कमाई कर    भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को नए मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया।    इस फिल्म ने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को एक बात और भी बताई कि यदि भोजपुरी फिल्मों में थोड़ा सी देशी अश्लीलता  परोसी जाए तो फिल्में चल सकतीं हैं। इसकी वजह यह थी कि इस फिल्म में एक गाना था , जिसके बोल थे सैयां दिल मांगे गमछा बिछाइकै। इस  गाने ने  भी अपने  समय में काफी चर्चा बटोरी थी। इसके बाद भोजपुरी फिल्मों को संजीवनी मिल गई। मगर साथ में मिल गया लोक गीतों के नाम पर अश्लीलता परोसने का नया फॉर्मूला।

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