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आखिर शीर्ष अदालत जनभावनाओं का ख्याल कब रखेगी ?

(कर्ण हिन्दुस्तानी )
अयोध्या की रामजन्म भूमि फिर एक बार चर्चा में है। इस बार तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई है जो कि मध्यस्था से मार्ग निकालेगी। यानी कि यह तीन लोग (सेवानिवृत्त न्यायाधीश कलीफुल्ला , आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और अधिवक्ता श्रीराम पांचू )तय करेंगे कि अयोध्या की भूमि किसको सौंपी जाए ? अयोध्या की विवादित बना दी गई ज़मीन पर राम जी का मंदिर बनेगा या फिर बाबर का स्मारक (मस्जिद ) बनेगा।
यह तीनो लोग बाबरी मस्जिद के हिमायतगारों और राम भक्तों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे। हिन्दुस्तान की शीर्ष अदालत के किसी भी फैसले की आलोचना किये बगैर हम पूछना चाहते हैं कि कई मामलों में आधी – आधी रात को अदालत के ताले खोले जातें हैं और फैसले सुनाए जातें हैं।  फिर राम मंदिर के मामले में यह नौटंकी क्यों की जा रही है।  हिन्दुस्तान की नस नस में प्रभु राम बसे हुए हैं।
सुबह का पहला शब्द जय राम जी की होता है। यदि कन्धों पर किसी की मय्यत पड़ी होती है तो हर किसी के मुँह से राम नाम सत्य ही निकलता है। हिन्द की संस्कृति में राम बसे हैं। हमारी संस्कृति में मर्यादा पुरुषोत्तम एक ही हैं और वह हैं प्रभु राम।  पूजा तो हम ब्रह्मा – विष्णु और महेश की भी करते हैं।  किन्तु जो दर्ज़ा प्रभु राम का है वह अलग ही है। प्रभु राम हमारी संस्कृति के अग्रज हैं। ऐसे में देश की शीर्ष अदालत राम जन्म भूमि को और भी विवादित क्यों बना रही है यह बात समझ में नहीं आती।
हज़ारों साल पहले अयोध्या की पावन धरती पर प्रभु राम का जन्म हुआ था।  बाबर तो आतंकियों की तरह आया और उसने हमारी संस्कृति को तहस नहस किया।  प्रभु राम की जन्मस्थली को उजाड़ दिया।  यह बात सभी जानते हैं। फिर विवाद किस बात का है।  क्यों मध्यस्थ बनाकर करोड़ों लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।  कल को यदि हिन्दुस्तान की जनता के सब्र का बाँध टूट गया और देश में अराजकता का माहौल बन गया तो उसका ज़िम्मेदार कौन होगा ?
विश्व हिन्दू परिषद , बजरंग दल , हिन्दू महासभा और राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ जैसे संगठन यदि करोड़ों लोगों की भावनाओं का आदर करते हुए राम मंदिर निर्माण के लिए सड़कों पर उतर आये तो उसका ज़िम्मेदार कौन होगा ? देश की शीर्ष अदालत भी तब आलोचनाओं से नहीं बच सकेगी।  बाबर और प्रभु राम को एक ही तराज़ू में तौलना हर दृष्टी  कोण से गलत है।  शीर्ष अदालत को इस बारे में सोचना ही होगा और जनभावनाओं का ख्याल रखते हुए हिन्दुओं के हक़ में फैसला सुनाना चाहिए

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