महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’की ओर से ‘आनंदप्राप्ति’ विषय पर शोध-प्रबंध वाराणसी के अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन में प्रस्तुत
नामजप, स्वभावदोष निर्मूलन तथा सात्त्विक जीवनपद्धति इन तीन सूत्रों से आनंदप्राप्ति संभव !

निरंतर सुख अनुभव करने की कामना ही मनुष्य के प्रत्येक कृत्य की प्रेरणा है । फिर भी, संपूर्ण मानवजाति जिसे पाने के लिए सदैव उतावली रहती है, वह ‘आनंदप्राप्ति’ विषय आजकल के विद्यालयों और महाविद्यालयों में नहीं पढाया जाता । नामजप, स्वभावदोष-अहं निर्मूलन और सात्त्विक जीवनपद्धति ये तीन सूत्रों को दैनिक आचरण में लाकर, सर्वोच्च और स्थायी सुख, अर्थात आनंद प्राप्त किया जा सकता है, यह विचार महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के नीलेश सिंगबाळ ने व्यक्त किया । वे, ‘स्पिरिच्युएलिटी बियॉन्ड रिपरटॉयर : अ लीडरशिप की टू सोसायटल हैपिनेस एंड सस्टेंड हार्मनी’ विषय पर आयोजित ७ वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रहे थे । इस सम्मेलन का आयोजन ‘स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइन्सिस, वाराणसी’ ने २३ और २४ फरवरी को वाराणसी में किया था । नीलेश सिंगबाळ ने इस सम्मेलन में २४ फरवरी को ‘आनंदप्राप्ति की प्रायोगिक और प्रमाणित पद्धति’ नामक शोधप्रबंध पढा । महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी इस शोधप्रबंध के मुख्य लेखक तथा नीलेश सिंगबाळ, शान क्लार्क सहलेखक हैं ।
नीलेश सिंगबाळ ने आगे कहा, जीवन की समस्याआें से हम दुःखी होते हैं । इस दुःख से हमारी मनःशांति और सुख में बाधा आती है । हमारे जीवन की समस्याआें के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ये ३ मूल कारण होते हैं । जीवन की ५० प्रतिशत से अधिक समस्याएं आध्यात्मिक कारणों से होती हैं, जो प्रायः शारीरिक अथवा मानसिक समस्याआें के रूप में प्रकट होती हैं । इसके आंकडे आध्यात्मिक शोध से प्राप्त हुए हैं । प्रारब्ध (भाग्य), पूर्वजों के अतृप्त लिंगदेह और अन्य सूक्ष्म स्वरूप की अनिष्ट शक्तियां, ये ३ प्रमुख आध्यात्मिक कारण हैं । समस्याआें के निवारण हेतु उनके मूल कारणों का पता लगाकर उसके अनुसार उपाय करने पडते हैं । जब किसी समस्या का मूल कारण आध्यात्मिक होता है, तब उपाय भी आध्यात्मिक करने पडते हैं । आध्यात्मिक उपाय से शारीरिक और मानसिक समस्याएं भी दूर होने में सहायता होती है । ऐसा तब होता है, जब इन समस्याआें का मूल कारण प्रायः आध्यात्मिक होता है ।
अंत में नीलेश सिंगबाळ ने आनंदप्राप्ति के लिए बताए निम्नांकित ३ प्रमुख प्रयत्न
१. नामजप : यह (आनंदप्राप्ति की) एक सरल और अत्यंत प्रभावी पद्धति है । नामजप से उत्पन्न होनेवाले आध्यात्मिक स्पंदनों से मन शुद्ध होने लगता है । ये स्पंदन जपकर्ता के सर्व ओर सूक्ष्म प्रकार का कवच बनाकर, कष्टदायक स्पंदनों से उसकी रक्षा करते हैं । प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने धर्मानुसार नामजप कर सकता है । वर्तमान समय में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’, यह एक अत्यंत प्रभावी नामजप है ।
नीलेश सिंगबाळ ने नामजप के सकारात्मक प्रभाव मापने के लिए किए गए एक प्रयोग के विषय में बताया । ‘जी.डी.वी. बायोवेल’ नामक वैज्ञानिक उपकरण के माध्यम से व्यक्ति के कुंडलिनी चक्रों का मापन किया जाता है । इस प्रयोग में एक व्यक्ति का कुंडलिनी चक्र, नामजप से पहले अपने मूल मध्य स्थान से हटा हुआ दिखाई दिया । उसने केवल ४० मिनट ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ यह जप किया, तो उसके सभी कुंडलिनि चक्र अपने-अपने मूल स्थान पर और एक रेखा में आ गए, ऐसा दिखाई दिया । कुंडलिनी चक्रों की यह स्थिति दर्शाती है कि उस व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति अधिक अच्छी है ।
२. स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया : मन पर बने स्वभावदोषों के संस्कार नष्ट करने के लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने यह प्रक्रिया विकसित की है । इस प्रक्रिया के विषय में हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण के विषय में पूज्य नीलेश सिंगबाळ ने जानकारी दी । इस सर्वेक्षण में बताया गया है कि यह प्रक्रिया करनेवाले ५० साधकों ने प्रयोग में भाग लिया था । उसमें ९० प्रतिशत साधक व्यवसायी थे । यह प्रक्रिया आरंभ करने के पहले उनसे अपने जीवन के ३ प्रमुख दोषों की सूची बनाने के लिए कहा गया । साधकों ने बताया कि हमें इन स्वभावदोषों को ५० से ८० प्रतिशत घटाने के लिए ,लगभग २ वर्ष ५ महीने लगे थे । संबंधों में और कार्यक्षमता में बहुत सुधार हुआ है, ऐसा ७३ प्रतिशत साधकों ने बताया, तो केवल कार्यक्षमता बढी है, ऐसा ७७ प्रतिशत साधकों ने बताया ।
३. सात्त्विक जीवनपद्धति अपनाना : हमारे प्रत्येक कार्य और विचार में सकारात्मकता अथवा नकारात्मकता बढाने की क्षमता होती है । जैसे-जैसे हमारी आध्यात्मिक उन्नति होती जाती है, वैसे-वैसे हममें अपने कपडे, संगीत, आहार, पेय आदि दैनिक जीवन से संबंधित वस्तुआें के स्पंदन जानने की क्षमता उत्पन्न होती है । हमारा चयन जितना सात्त्विक होगा, उतना हमें जीवन में आनंद और शांति का अनुभव होगा ।

