कम होता जा रहा है देश के सबसे बड़े संवैधानिक संस्थान, सर्वोच्च न्यायालय का महत्व !
(कर्ण हिंदुस्तानी )
पिछले कुछ वर्षों से भारतीय लोकतंत्र में एक अज़ब सा चलन चल निकला है और वह है कि देश के सबसे बड़े संवैधानिक संस्थान सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को एक अध्यादेश लाकर बदल देना। अपने वोट बैंक को बचाने की खातिर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को रद्द करना इस बात का संकेत है कि सब कुछ राजनीती के ही मातहत होगा। सर्वोच्च न्यायालय वगैरह का निर्णय संसद में विराजमान लोगों को यदि मान्य नहीं है तो किसी को भी मान्य नहीं है।
लोकतंत्र में कार्यपालिका का महत्वपूर्ण स्थान है इसको झुठलाया नहीं जा सकता। मगर लोकतंत्र में सर्वोच्च न्यायालय का भी महत्व कम नहीं है। फिर सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को क्यों एक अध्यादेश के जरिये बदलने की परम्परा शुरू हो गई है। लोकप्रतिनिधि मनमाने ढंग से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को बदलने की जद्दोजेहद में लगें हुए हैं।वर्षो पुराना शाहबानो मामला हो या फिर तीन तलाक का मामला हो , या फिर मुंबई के डांस बारों का मामला हो तकरीबन हर मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को तवज्जो नहीं दी गई। यहां तक कि लोकप्रतिनिधियों ने न्यायाधीशों की नियुक्ति पर भी राजनीती करने पहल शुरू कर दी है।
इन्ही वजहों से राम मंदिर मामले पर सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों की पीठ में से एक न्यायाधीश ने पीठ से खुद को अलग कर दिया। मुंबई के डांस बार शुरू करने और शुरू ना करने को लेकर बार मालिकों और राज्य सरकार की सर्वोच्च न्यायालय में २००५ से ही जंग चल रही है। विगत तरह सालों से चल रही सुनवाई में करोड़ों रूपये सर्वोच्च न्यायालय पर फूंक डाले गए। सर्वोच्च न्यायालय का समय भी बर्बाद किया गया और जब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया तो उस फैसले को एक अध्यादेश लाकर बदलने की बात महाराष्ट्र के वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने कर दी।
तीन तलाक के मुद्दे पर भी अदालत के फैसले को ख़ास तवज्जो ना देने की मानसिकता पहले से राजनीतिक दलों ने बना रखी थी। मुद्दे की बात यह है कि जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के सामने अपना फैसला ही सही साबित करना है तो सर्वोच्च न्यायालय की ज़रूरत ही क्या है ? सभी जानते हैं कि राम मंदिर मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में चल रही है , जो फैसला आएगा वह सर्वमान्य होगा। मगर अभी से न्यायालय के फैसले के विरुद्ध अध्यादेश लाने की बातें होने लगीं हैं। यदि अध्यादेश लाना ही है तो सर्वोच्च न्यायालय का समय क्यों बर्बाद किया जा रहा है ?
एक अपराधी को बचाने के लिए आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय को खोलना किस मानसिकता का प्रतीक है ? क्या सर्वोच्च न्यायालय कोई मेडिकल स्टोर है कि आधी रात को भी खोली जा सके ? यदि इसी तरह से सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को एक अध्यादेश के जरिये बदला जाता रहा तो निकट भविष्य में सर्वोच्च न्यायालय का महत्व शून्य होने की कगार पर आ जाएगा। इस बात को तमाम राजनीतिक दलों को महत्व देना ही होगा। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अंतिम निर्णय माना जाए तभी लोकतंत्र को मजबूती हासिल होगी।

