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बेबाक लेखनी के बादशाह सरवर भारती का निधन

बेबाक लेखनी के मालिक सरवर भारती का निधन
(कर्ण हिंदुस्तानी )
विगत चालीस सालों से बेबाक कविताओं के लिए प्रसिद्द कवि सरवर भारती का बुधवार को मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया।

पत्रकारिता और कविताओं सहित कई मुशायरों में अलग शैली के लिए अपनी जगह बनाने वाले सरवर भारती ,मुंबई का चेहरा नामक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक भी थे।

सामाजिक , सांस्कृतिक साहित्यिक संस्था एकता सांस्कृतिक मंच के संयोजक सरवर भारती ने अपनी लेखनी से लोकतंत्र पर कई बार प्रहार किया था।

एक जगह सरवर भारती लिखते हैं ,
रही है और रहेगी , मक्कारी मेरी शायरी में ,
किसी उल्लू के पट्ठे को मैं लीडर मान नहीं सकता।

अपनी लेखनी से जब उनका घर नहीं चला तो सरवर भारती ने लिखा

बनती है इसकी रोटी , ना भाजी में पड़ती है
सरवर बताओ शायरी , किस काम आती है।
सरवर अगर ना होता , तुम्हें शौंके शायरी
इंसान समझे जाते , और कहलाते आदमी।

किसी फ़क़ीर की तरह जीने वाले सरवर भारती जी के साथ की बात करूँ तो मेरे साहित्यिक गुरु स्वर्गीय आलोक भट्टाचार्य जी और सरवर भारती के साथ मैंने कई कवी सम्मेलनों में कविताएं पढ़ी थीं।

आलोक जी जैसे तेवर ही सरवर भारती के भी थे। एक जगह वह लिखते हैं।

घूमते हैं सीना ताने , बिरला टाटा के दलाल
खाते हैं माले कमीशन , हो रहे मालामाल
देश की चिंता हो जिसको , एक भी ऐसा नहीं
नेता कहलाने लायक , एक भी नेता नहीं।

१९९५ में जब महाराष्ट्र में पहली बार बीजेपी – शिवसेना की सरकार बनी तो सरवर भारती ने अराजकता पर लिखा कि

अनुदान जो आया – आकर किधर गया
पूछो उनका झुनका भाकर किधर गया ,
बातें करता था जो रामराज्य की
गुंडों को कुर्सी पर बिठा कर किधर गया।

खुद पत्रकार होने के बावजूद सरवर भारती ने एक जगह लिखा कि

देखो उधर लगा है वो बाज़ारे मीडिया
अखबार खरीदो या , पत्रकार खरीदो ,
जैसा कहोगे वैसा ही , पेपर में आएगा
देना पड़ेगा सिर्फ , कुछ हज़ार खरीदो।

१९८७ में रौशनी चाहिए के शीर्षक तले उनका पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ , इसके बाद १९८८ में मेरे गीत नामक गीत संग्रह आया , २००४ में हिन्दोस्तां हमारा काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ ,

२००६ में फुले और आम्बेडकर काव्य संग्रह का प्रकाशन हुआ , फिर २००६ में ही ज़ख्मों की खुश्बू के रूप में उनका पांचवा काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ।

इसके बाद इंसान ज़िंदाबाद और इंतज़ार है नामक कविता संग्रह प्रकाशित हुए। कई लोक गीतों को भी संगीत बद्ध कर सरवर भारती ने साहित्य जगत में अपनी उपस्थिति का एहसास करवाया।

आज सरवर भारती जैसा लेखक हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी रचनाएँ हमेशा हमारे साथ रहेंगीं। मुंबई आसपास की तरफ से सरवर भारती जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

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