जब रक्षक ही भक्षक बन जाए’ ये मुहावरा तो आप वर्षों से सुनते आ रहे हैं परंतु हमारी रक्षा करनेवाले अब स्वयं को असुरक्षित एवं सुविधाहीन समझने लगे हैं यह कल्याण पश्चिम स्थिति पुलिस कॉलोनी में महसूस की जाने लगी है।
जब पानी सर से ऊपर से गुजरने लगता है तो वही कहावत चरितार्थ होने लगती है कि कहा भी न जाए और सहा भी न जाए।
जी हां, ऐसी ही कुछ स्थिति है हमारे कल्याण के पुलिस वालों की। ये फरियाद करें तो किससे करें। कल्याण पुलिस उच्चाधिकारियों की सुविधाएं और आवासीय स्थिति देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पुलिस वाले बड़े सुखी हैं परंतु वहीं पर यदि हम सिपाहियों की कॉलोनी पर नजर डालते हैं तो हमें रोना आता है। दु
भर के सरकारी अधिकार और रुआब रखनेवाले ये पुलिसकर्मी जब अपने घर में जाते हैं तो मन मारकर रह जाते हैं। इनकी कॉलोनियों की दीवारें, फर्श और छतों की ओर जब आपकी नजर जाएगी तो सचमुच तरस आएगा। साफ-सफाई की बात तो हम बाद में करेंगे सबसे पहले दीवारों पर उगे वृक्षों पर नजर डालेंगे तो लगेगा कि ये दीवार नहीं बल्कि कोई बगीचा है।
दीवारें जर्जर हो चुकी हैं, कमरे में सीलन और रीसन भरे हुए हैं। पाइपलाइन और जल निकास सब रामभरोसे बह रहे हैं। यदि चोर इन दीवारों पर एक लात जोर से मारें तो सीधे मकान के अंदर, भले ही वे लिहाज, संकोच और डर की वजह से ऐसा नहीं करते पर स्थिति करीब-करीब ऐसी ही है।
क्या पुलिस के उच्चाधिकारियों की नजर इसपर नहीं है या वे अपने आलीशान बंगले और भवनों के रख-रखाव से समझ लेते हैं कि सभी कर्मचारियों के मकान ऐसे ही होंगे। पर अब समय आ गया है इन जर्जर पुलिस कॉलोनियों पर नजर डालने की।
एक सिपाही ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि समाज के लोग हमसे डरते हैं परंतु हम अपने घर में जाकर हालात से डरने लगते हैं।
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