(कर्ण हिन्दुस्तानी )
बेवकूफ दोस्त से अक्लमंद दुश्मन अच्छा , यह कहावत अब राहुल गांधी को समझ आ रही होगी। २०१४ के बाद २०१९ में करारी शिकस्त के बाद राहुल गाँधी इन दिनों जिस कठोरता से पार्टी के पदाधिकारियों के सामने पेश आ रहे हैं वह बहुत पहले होना चाहिए था। दरअसल राहुल गाँधी के आसपास ऐसे चमचों की भीड़ जमा हो चुकी थी जिनका एक ही मकसद था गाँधी परिवार से कांग्रेस को मुक्ति दिलवाना।
बरसों की गाँधी परिवार की जी हज़ूरी के बाद अचानक खिलाफत करना तो सम्भव नहीं था सो राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गाँधी के आसपास ऐसे सलाहकार नियुक्त कर दिए गए जिन्होंने राहुल गाँधी को मुद्दों की राजनीती से दूर कर दिशाहीन बना दिया। मोदी की खिलाफत से चुनाव जीता जा सकता है , मोदी को चोर कहकर चुनावी नैय्या पार हो सकती है , संसद में खुद को पप्पू कहकर मोदी पर प्रहार किया जा सकता है , राफेल की कीमतों और उसकी गुणवत्ता पर हंगामा किया जा सकता है आदि बातें आखिर राहुल गाँधी के मुँह में कौन डाल रहा था ?
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विरासत में मिले राजनीतिक दल का मुखिया बनने के बाद आखिर क्यों और किसने राहुल गाँधी को राज्यों की कांग्रेस में चल रही अंदरूनी राजनीती से अनभिज्ञ रखा। इस बात का एहसास राहुल गाँधी को क्यों नहीं होने दिया गया कि सेवा दल खत्म हो गया , नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ़ इंडिया का इस्तेमाल कांग्रेस ने युवकों को कांग्रेस से जोड़ने के लिए क्यों नहीं किया ? कांग्रेस ने विगत पांच सालों में कितने नए कार्यकर्ता अपने साथ जोड़े ? विश्लेषण तक नहीं हो सका कि २०१४ में कांग्रेस ४४ सीटों पर क्यों सिमटी गई।
सिर्फ मोदी विरोध कर चुनाव जीतने का विचार आखिर किस सलाहकार का था , उसकी पहले कांग्रेस से छुट्टी होनी चाहिए। विगत तीन – चार दिनों से राहुल गाँधी ने जो कड़क रवैय्या अपनाया है वह काफी पहले अपनाना चाहिए था। आज राहुल गाँधी केआसपास वही घराने के युवा हैं जिनके बाप दादा कभी राजीव गाँधी के आसपास हुआ करते थे। इन लोगों की वजह से ही राजीव गाँधी मात्र एक बार ही प्रधानमंत्री बन सके।
कांग्रेस को यदि देश में पुनर्जीवित करना है बीजेपी के साथ वैचारिक लड़ाई लड़नी होगी। राहुल गाँधी को शायद पता भी नहीं होगा कि जब इंदिरा गाँधी ने पाकिस्तान के टुकड़े कर बांग्लादेश का निर्माण करवाया था तब अटल बिहारी वाजपेयी जैसे विपक्षी नेता दिल्ली के रामलीला मैदान में इंदिरा जी के फैसले की तारीफ़ करते हुए जनसभाएं कर रहे थे। आज तो सर्जिकल स्ट्राइक पर ही उंगलियां उठाई जाने लगीं। ऐसे सलाहकारों से राहुल गाँधी को दूरी बनानी ही होगी वरना आगे भविष्य में कुछ नहीं होने वाला।
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