नहाये खाये के दिन को छठवर्ती माताये छठ पूजा की पूर्व तैयारी के रूप मे मानती है और कड़ाके की ठंड (बिहार और झारखंड मे हर वर्ष छठ मे कड़ाके कि ठंड रहती है।) होने के बावजूद घर का हर सदस्य सुबह नहाकर और पूजा पाठ कर के ही खाना खाता है। छठ व्रत करने वाली माताओ के साथ घर कि हर महिला सदस्य सुबह नहाकर ही रसोई मे जाती है।
गणेशोत्सव और छठ पूजा मे समानता
नहाये खाये के दिन छठवर्ती माताये अपने द्वारा बिना मसाले ओर सेंधा नमक से बने दाल, सब्जी ओर चावल, रोटी का प्रसाद सिर्फ एक बार ग्रहण करती है। और छठी मैया के ध्यान मे मगन होजाती है।
अगले दिन शुरुवात होता है छठ व्रत के खरना का। पहले दिन से ही यह व्रत छठ वर्ती माताओ के लिए तपस्या जैसा रहता है।
खर-ना, नाम के अनुसार ही छठवर्ती माताओ को मुह मे खर (लकड़ी का छोटा टुकड़ा ) भी लेना वर्जित रहता है। पूरे व्रत मे पानी तो दूर उन्हे मुह मे लकड़ी का छोटा टुकड़ा भी डालना मना रहता है।
शाम को चंद्रोदय के साथ मिट्टी के चूल्हे पर आम की सुखी लकड़ियों को जला कर बने खिर का प्रसाद को चढ़ाकर प्रसाद के रूप मे छठ वरती माताये भी यही प्रसाद ग्रहण करती है और पानी पिती है।
सनातन संस्था के सत्संगों मे बताया गया छठ पूजा का शास्त्र
फिर शुरू होता है छठ व्रती माताओ की असली तपस्या, पूरे 36 घंटे का निराजल व्रत
खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद छठ व्रती माताओ को संध्या अर्घ यानि अगले पूरे दिन और रात निराजल उपवास रखना रहता है। और सुबह के अर्घ और सूर्य उपासना के बाद ही उन्हे प्रसाद ग्रहण करने का नियम है।