डोम्बिवली औधोगिक परिसर के कपड़ा प्रोसेसिग करने वाली कम्पनियों के चिमनियो से निकलने वाले धुएं से ना सिर्फ आसपास के क्षेत्र में प्रदूषण फैलता है बल्कि इन चिमनियो से बेस्ट कोयले के छोटे छोटे और काले काले कण आसपास के निवासी क्षेत्रो में लगातार लगातार गिरते रहते है महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल की तरफ से इस पर सिर्फ दिखावे की कारवाई की जाती है जबकि कपड़ा प्रोसेसिंग कम्पनिया सिर्फ दिखावे के लिए इस वायु प्रदूषण रोकने के लिए आवश्यक मशीनरी अपने कम्पनियों में लगाए रखने का ढोंग करती है,और इसे तभी चलाया जाता है जब प्रदुषण मंडल के अधिकारियों का इन कम्पनियों में दौरा रहता है.
डोम्बिवली के कपड़ा प्रोसेस कम्पनियो के प्रदूषित धुओ से हजारो लोग प्रभावित, प्रदुषण मंडल उदासीन
ज्ञात हो की १५ – २० वर्ष पहले इन कपड़ा प्रोसेसिंग कम्पनियों में देशी कोयले का उपयोग होता था.लेकिन शुरुवात में रिलायंस ने दक्षिण अफ़्रीकी देशो से और इंडोनेशिया से डस्ट कोयला आयत करना शुरू किया.देशी कोयला जहा ५० -६० रुपये किलो था वहि ये विदेशी कोयला आज भी ७ से ७.५० रुपये किलो कपनी मालिको को कम्पनी में पहुचा कर मिल जाता है.विदेशी डस्ट कोयले के उपयोग से प्रति माह हर कपड़ा प्रोसेसिंग कम्पनियों को करोड़ो रुपयों का फायदा होने लगा है.
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इस डस्ट कोयले के उपयोग से कपड़ा प्रोसेसिंग कम्पनियों को भले ही करोडो का फायदा होने लगा हो लेकिन इसके नुकसान भी जबर्दस्त है.
!) इस डस्ट कोयले के धुएं से निकलने वाले छोटे छोटे रेत के कण कपंनी से दूर दूर तक जाकर गिरता है और फिर वहा के मिटटी में मिश्रित हो जाता है इससे जमीन की उरवर्क क्षमता समाप्त हो जाती है.
२) छोटे और गर्म होने के कारण ये डस्ट कोयले के कण घरो के खिड़की दरवाजो के रास्ते घरो में जमा हो जाते है. इन कम्पनियों के आसपास रहने वाले अनेक लोगो की उनके घरो के अंदर बन रहे भोजन में भी इन डस्ट कोयलों के अंश देखे जा सकते है.
३) इन कम्पनियों के पास से गुजरने वाले सैकड़ो लोग आँख में इन डस्ट कोयले के कण चले जाने के भुक्त भोगी है
४) और सबसे ज्यादा नुकसान इन कपड़ा प्रोसेसिंग करने वाली कम्पनियों के पास के निवासी क्षेत्रो का है.यहाँ ओधोगिक परिसर से लगकर ही निवासी विभाग है.जहा ज्यादातर एसबेस्टस की छतो वाली चाले है और ये डस्ट कोयले का कण इन छतो पर जमा हो जाता है.और बरसात के दौरान इन घरो की हालत बदतर होती है.जहा घरो में पानी ही पानी होता है.
५) पर्यावरण के हिसाब से भी ये ये डस्ट कोयला बेहद खतरनाक माना जाता है. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से देश के पर्यावरण विभाग इस पर उदासीन रवैया अपना रखा है. क्योकि इस कोयले को एक से दो दिन ऐसे ही धुप में छोड़ दिया जाए तो उसमे अपने आप आग पकड लेता है.
हलाकि इन परिस्थितयो का अंदाजा यहाँ के प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारियों को भी है.और इसी लिए इन सभी कम्पनियों में इस डस्ट कोयले के प्रदूषण खत्म करने के लिए आवश्यक मशीन “बेक फ़िल्टर पैनेल” भी लगा है लेकिन इस मशीन के लगातार परिचालन में हर महीने ३ से ४ लाख रुपये का खर्च है जो की देशी कोयले में होने वाले खर्च का एक गुना भी नही है,
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जबकि प्रदुषण मंडल के अधिकारी इन कम्पनियों से महज कुछ हजार रिश्वत ले कर इन कम्पनियों को मनमानी करने की खुली छुट दे देते है.इन कम्पनियों में “बेक फ़िल्टर पैनेल” मशीन नही चलाये जाने का एक कारण यह भी है इस मशीन के मेंटेनेस के लिए हर महीने कम से कम दो से तीन दिन का समय लगता है. इस दौरान कपनी मालिको को कम्पनी बंद रखना मंजूर नही इसी लिए ये कम्पनी प्रबंधन यहाँ के प्रदूषण मंडल के अधिकारियों को रिश्वत दे कर वर्षो से अपनी मनमानी कर रहे है.
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