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चीनी दीयों को टक्कर दे रहे मिट्टी के 24 तरह के आकर्षक दीये, 3,861 महिलाओं को मिल रहा रोजगार

चीनी दीयों को टक्कर दे रहे मिट्टी के 24 तरह के आकर्षक दीये, 3,861 महिलाओं को मिल रहा रोजगार

शीतला प्रसाद सरोज

मुंबई। दीपावली पर स्वदेशी और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की पहल के तहत जनप्रहार फाउंडेशन ने बाजार में मिट्टी के आकर्षक और विभिन्न डिजाइनों वाले दीये उतारे हैं। महिला बचत गट की कारीगरों द्वारा तैयार इन दीयों की अंधेरी, जोगेश्वरी, गोरेगांव सहित आसपास के क्षेत्रों में अच्छी मांग है। संस्था की इस पहल से जहां चीनी दीयों को स्थानीय बाजार में चुनौती मिल रही है, वहीं सैकड़ों महिलाओं को रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता का अवसर भी मिल रहा है।

धारावी-माहिम से आता है कच्चा माल

जनप्रहार फाउंडेशन की महिला विभाग प्रमुख तरुणा कुंभार ने बताया कि दीये बनाने के लिए कच्चा माल धारावी-माहिम से अंधेरी लाया जाता है। इसके बाद महिला बचत गट की कारीगर अपनी कला और हुनर से मिट्टी को आकर्षक दीयों का रूप देती हैं। उन पर रंग-रोगन और सजावट कर अलग-अलग डिजाइन तैयार किए जाते हैं।

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351 बचत गट से जुड़ी हैं 3,861 महिलाएं-

फाउंडेशन के अधीन 351 महिला बचत गट कार्यरत हैं। प्रत्येक गट में 11 महिलाएं शामिल हैं। इस तरह कुल 3,861 महिलाएं संस्था से जुड़ी हैं। दीये और अन्य घरेलू उत्पाद तैयार कर ये महिलाएं अपनी मेहनत को आमदनी का जरिया बना रही हैं।

24 तरह के दीयों की खास मांग-

महिलाएं कुल 24 तरह के आकर्षक दीये तैयार कर रही हैं। इनमें पंचमुखी, चारमुखी, अखंड, कछुआ, नारियल और हाथी छाप दीये प्रमुख हैं। अखंड दीया विशेष आकर्षण का केंद्र है। इसमें एक पाव तेल डालने पर यह रातभर जल सकता है। इसके अलावा दीपावली के लिए चिवड़ा, नानखटाई, सेव और गुझिया जैसे खाद्य पदार्थ भी तैयार किए जा रहे हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में लगाए गए स्टॉल-

उत्पादों की बिक्री के लिए मालपा डोंगरी, नागरदास रोड, शांतिनगर, महाकाली और सिब्झ सहित विभिन्न क्षेत्रों में स्टॉल लगाए गए हैं। जोगेश्वरी और गोरेगांव में भी इनकी अच्छी मांग है।

वोकल फॉर लोकल को बढ़ावा-

फाउंडेशन के संस्थापक एड. रविकांत शुक्ला ने कहा कि संस्था का उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना और भारतीय कारीगरों को बाजार उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि महिलाओं द्वारा तैयार दीये और खाद्य पदार्थ न केवल स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित कर रहे हैं, बल्कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में भी मददगार साबित हो रहे हैं।