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आखिर कब तक बेचारे बने रहेंगे भारतीय नागरिक ?

(कर्ण हिन्दुस्तानी )
आज़ादी के बाद से अब तक यदि विचार किया जाए तो भारतीय नागरिकों को सत्ताधारियों से कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। यहां तक कि भारतियों के पास भारतीय होने का प्रमाणपत्र तक नहीं है। पहले राशन कार्ड को ही भारतीय नागरिक अपने भारतीय होने का प्रमाण पत्र मानते थे , मगर राशन कार्ड भी नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है , फिर पेन कार्ड को लाया गया , मतदाता पहचान पत्र जारी किया गया और अब आधार कार्ड सबके हाथ में है।  इस आधार कार्ड के पीछे भी स्पष्ट शब्दों में अंकित है कि यह कार्ड नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है।  यही वजह है कि भारत के नागरिक कभी भी अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सकते। देश के संविधान में कई बातें हैं जो नागरिकों को घटना घटने के बाद समझ में आतीं हैं।  जैसे  किसी बैंक के डूब  जाने के बाद या फिर रिज़र्व बैंक के प्रतिबंध लगाने के बाद नागरिकों को समझ में आता है कि आपके खाते में चाहे कितनी भी रकम जमा हो बैंक आपको सिर्फ एक लाख रुपया  वापस करने का हक रखता है।
भारत में यदि किसी नागरिक की आतंकवादी वारदात में मौत हो जाती है तो मारे गए व्यक्ति के परजनों को राज्य अथवा केंद्र सरकार के विवेक के आधार पर ही मुआवजा मिलता है।  कोई भी धनराशि निश्चित नहीं है। जबकि भारत में रहने वाला हर नागरिक भले ही आयकर ना भरता हो मगर वह जो रोजमर्रा की वस्तुएं खरीदता है उस पर सभी कर सहित स्पष्ट अंकित होता होता है।  यानी कि आयकर की फाइल ना बनाने वाला नागरिक भी कर अदा कर रहा है। हर नागरिक जिसके पास कोई भी वाहन है वह सड़क कर यानी कि रोड टैक्स अदा करता है।  यह रोड पर वाहन चलाने का टैक्स होता है।  जब यह टैक्स वसूल किया जा रहा है तो फिर टोल टैक्स क्यों लगाया जाता है ?आम भारतीय नागरिक यदि लम्बी दूरी की गाड़ियों में सफर करता है और ट्रैन दुर्घटना हो जाती है तो रेल मंत्रालय के विवेक पर उस नागरिक को मुआवजा मिलता  है।  अब तो सरकार ने यात्रियों की सुरक्षा हेतु एक रूपये में इन्सुरेंस का काम हाथ में लिया है।  रेल की टिकिट के साथ एक रुपया अतिरिक्त शुल्क भरें और एक निश्चित बीमा राशि  मरने अथवा घायल होने पर आपके परिजनों को मिल जाएगी। यानी कि सरकार आपसे वसूले गए  पैसे से ही आपकी सुरक्षा करेगी।  सरकार  को आप जो मूल रकम दे रहे हैं वह सरकारी तिजोरी में जमा हो जाएगी। भारत के नागरिकों को सरकारी सुविधा के नाम पर चुनावी आश्वासनों के सिवा कुछ नहीं मिलता। विभिन्न वित्तीय संस्थानों में करोड़ों अरबों रुपयों का घोटाला करके लोग विदेश भाग जाते हैं।  इन घोटालों  का खामियाजा आम जनता भुगतती है।  सरकार  ने ऐसे कोई नियम नहीं बनाये हैं जिनके तहत एक विशिस्ट रकम बतौर कर्ज लेने पर आपको अपना पासपोर्ट बैंक में जमा करना  पड़ सकता है।  सरकार की  इसी  कमी का फायदा उठाकर घोटालेबाज विदेश भाग जाते हैं।  मगर उसके नतीजे आम जनता भुगतती है।  आइये हम सब मिलकर भारत के नागरिकों को उनकी नागरिकता का पहचान पत्र उपलब्ध करवाने की लड़ाई लड़ें और सरकार पर दवाब बनाएं कि सरकार की खुफियां एजेंसियों की नाकामयाबी के चलते होने वाली मौतों के बाद नागरिकों को एक तय राशि का भुगतान भी हो सके।

rajesh

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