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महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी में पत्रकारों की घुसपैठ पर मुंबई आसपास को मिलीं कुछ तीखी – कुछ नरम प्रतिक्रियाएं।

( कर्ण हिंदुस्तानी )
शुक्रवार को मुंबई आसपास ने महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी में साहित्यकारों के बजाए पत्रकारों की घुसपैठ के बारे में खबर प्रकाशित की थी।  इस खबर के बाद कई लोगों ने अपनी बात बेबाकी से मुंबई आसपास के मंच पर रखी है। वरिष्ठ खेल पत्रकार और कवि अमिताभ जगदीश  जी ने जो कहा वह हम ज्यों का त्यों मुंबई आसपास के चाहने वालों के समक्ष रख रहे हैं।
अमिताभ जगदीश जी – क्या कहा जाए। साहित्य में साहित्य के लोगो को जिस प्रकार दूर फेंका जाता रहा है उसका इतिहास भी पुराना है। पत्रकारों का वहां होना ,और वे भी कैसे पत्रकार?  ख़ुशी होती कि ये पत्रकार किताबे पढ़ने और हिंदी साहित्य के इतिहास से भी परिचित होते। खैर,
इन सारे लोगो के पास अपने तर्क होते हैं। चूंकि अकादमी को अपनी चलने की औपचारिकता पूरी करनी होती है। तमाम खानापूर्ति करनी होती है तो जो जैसा मिल जाए वो पदाधिकारी। चलिए पत्रकारों की भीड़ को थोड़ी देर के लिए मान्य भी कर लिया जाए मगर वे अपने अधिकार का कौनसा प्रयोग कर रहे हैं ये भी देखा जाना जरूरी हो जाता है। हिन्दी साहित्य की सेवा करने वाले कितने पत्रकार रहे हैं इस मुम्बई में? जो हैं वे नज़रअंदाज़ हैं। अफ़सोस होता है किंतु कोई उपचार नहीं है। सब बहती गंगा में हाथ धोना चाहते हैं…अकादमी ही बेचारगी में है तो क्या कहा जाए। जिस दिन मुझ जैसे व्यक्ति को ढूंढ कर कोई अकादमी हेतु किताब लिखवाने का प्रयत्न करेगा, तब ये साबित होगा कि जो भीड़ है उनमें साहित्य और साहित्य की सेवा करने वाले ईमानदार भी हैं। पर ये असम्भव है।
दूसरी बात- इन्हें यदि साहित्यकार दीखते भी हैं तो कौनसे लोग दिखते है? शोध का विषय होगा ये कि वे ही क्यों अब तक जो हमेशा से ही हैं?
इन सबके बावजूद मैं पत्रकारों को बधाई देता हूँ और उम्मीद करता हूँ वे महाराष्ट्र हिंदी साहित्य को अकादमी में रहते बचाने का ईमानदाराना प्रयत्न करें।
इसी तरह शिवजी पांडेय शिवम जी ने भी जो कहा वह भी ज्यों का त्यों रख रहे हैं ,
शिवजी पांडेय शिवम जी – पत्रकारों को ओब्लाइज करनेके पीछे राजनीतिक ‘चमकेशगीरी’ को पुष्ट करने की आकांक्षा है।
पत्रकारों में अपनी लेखनी के लिए प्रसिद्द ओमकार मणि शर्मा ने भी अपनी प्रतिक्रिया भेजी है ,
ओमकार मणि शर्मा जी – देखिए! मै बहुत कुछ तो नही जानता हूँ। किसी गलती को सुधारा जा सकता है। आप यह करने मे सक्ष्म समर्थ हैं। आप को पसंद करना है कि आप क्या करना चाहते हैं। इसे सुधारना
या
इसकी छिछालेदर करना!
वस्तुतः मै इनमे से किसी को ब्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता हूँ।
जहाँ हिन्दी शब्द जुड़ा है उसके लिए मेरे मन मे सम्मान है।
पत्रकार या साहित्यिक परस्पर जुड़े ही हैं। कौन किस कौशल से किस विधा से हिन्दी को समृद्ध कर रहा है। उसकी अपना दृष्टिकोण है।
कुछ नही से कुछ होना अच्छा!
और
हिन्दी के ब्यापक हित के लिए और बेहतर विकल्प होना जरूरी है।
मै महसूस करता हूँ कि आप बेहतर विकल्पों को जानते हैं।
एक स्थिर निर्माण को ध्वस्त करके निर्माण करने के बजाय समयानुकूल निर्मित उपलब्ध ढांचे पर सुयोग्य निर्माण किया जाय।
हमारी शुभकामनाएँ है कि आप हिन्दी भाषा के हिन्दी साहित्य के लिए नेक सुरुवात करिए..॥
मुंबई आसपास की इस खबर के बारे में कोई पत्रकार अथवा साहित्यकार अपनी राय देना चाहता है तो उसका स्वागत है।

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