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महाराष्ट्र में आए राजनीतिक भूकंप के जिम्मेदार कौन?

महाराष्ट्र की मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन ?
(कर्ण हिंदुस्तानी )
पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र की राजनीती में जो उबाल आया हुआ है उसे देखते हुए मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस सारी स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है ?

पिछली बार जब विधानसभा चुनाव हुए थे तब शिवसेना और बीजेपी ने मिलकर चुनाव लड़ा और बाद में शिवसेना को लगने लगा कि उसने गठबंधन कर गलती की।

हालांकि शिवसेना के पास ऐसा कोई जादुई आंकड़ा नहीं था कि वह खुद के बल पर सरकार स्थापन कर सके। फिर भी उसने सरकार स्थापन करने की योजना को अमली जामा पहनाया और कांग्रेस – राष्ट्रवादी कांग्रेस को साथ लेकर सरकार की स्थापना कर दी।

शिवसेना जो अब तक किंग मेकर के रूप में पहचानी जाती थी। उस शिवसेना के पक्ष प्रमुख उद्धव ठाकरे ने ना सिर्फ अपने बेटे को चुनावी मैदान में उतारा बल्कि खुद भी पिछले दरवाजे से विधायक बन गए और मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हो गए।

एक बे मेल गठबंधन जनता को नज़र आया। शिवसेना के संस्थापक स्वर्गीय बाला साहेब ठाकरे की परम्परा को दरकिनार कर उद्धव ठाकरे सक्रीय राजनीती में उतर गए।

जबकि बाला साहेब इस मामले में काफी परिपक़्व थे। उन्हें पता था राजनीती में पद ग्रहण करने का मतलब है अपनी इज़्ज़त दांव पर लगाना।

उधर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस को सत्ता सुंदरी डोली में बिठाकर मिल गयी और कई बरसों से सत्ता के प्यासे दोनों दलों ने अपना जौहर दिखाना शुरू किया।

शिवसेना के विधायकों और मंत्रियों के काम एक एहसान किय्रे जाने की तरह किये जाने लगे। आखिर बगावत हुई और नतीजा सबके सामने है।

एकनाथ शिंदे की नाराज़गी को हल्के में लेने वाली शिवसेना ने राजनीती में जो बचपना दिखाया वह ठीक नहीं था। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सरकारी निवास छोड़ दिया।

यह भारत के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी गलती कही जा सकती है। सरकारी निवास छोड़ने का मतलब है अब सभी फाइलें मुख्यमंत्री अपने निजी निवास में देखेंगे जो कि कहीं ना कहीं नियमों के खिलाफ ही है।

अब बात करें बगावत करने वालों का महाराष्ट्र से गायब होना और गृह मंत्रालय को कानों कान खबर भी ना लगना। अनिल देशमुख के हिरासत में जाने के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस ने दिलीप वलसे पाटिल को राज्य का गृहमंत्री बनाया।

और हालत ऐसे हुए कि राज्य के गृह मंत्रालय को इस बात की खबर तक नहीं लगी कि सत्ताधारी दल में बगावत हो रही है।

मंत्रियों के साथ हमेशा साए की तरह रहने वाली सुरक्षा यंत्रणा भी धरी की धरी रह गयी। सारी सुरक्षा व्यवस्था असफल साबित हुई या फिर गृहमंत्रालय की सहमति से ही मुख्यमंत्री को बगावत होने की बात से अनभिज्ञ रखा गया।

इतने बड़े पैमाने पर यदि सत्ता में बगावत होती है तो राज्य की खुफिया एजेंसियां क्या घास छील रहीं थीं। इन्हीं कमियों की वजह से कांग्रेस के शासन में २६ /११ का हमला सम्भव हो सका था और कई लोगों समेत जांबाज़ पुलिस अधिकारियों को जान गंवानी पड़ी थी।

बात एकनाथ शिंदे की करें तो सत्ता के ढाई साल भोगने के बाद उनको याद आया कि जिस सरकार में वह मंत्री हैं , वह सरकार हिंदुत्ववादी नहीं है।

एकनाथ शिंदे को हिंदुत्व का इतना ही ख्याल है तो सरकार गठन के समय क्यों नहीं बगावत की ? ढाई साल तक तमाम तरह की सुविधाएं भोगने की बाद अगर किसी को हिंदुत्व का ज्ञान होता है तो मेरी नज़र में एकनाथ शिंदे का हिंदुत्व बोगस है।

स्वर्गीय आनंद दिघे साहेब और हिन्दू हृदय सम्राट स्वर्गीय बाला साहेब बनने की कोशिश करना भी बेवकूफी है। उद्धव ठाकरे ने भी यही भूल की और खुद को बाला साहेब का पुत्र समझने के बजाए खुद को बाला साहेब ही समझने लगे

और एकनाथ शिंदे खुद को आनंद दिघे समझने लगे हैं। यह भूल है। स्वर्गीय बाला साहेब ठाकरे ने अपने साथ समर्पित नेताओं की एक फ़ौज तैयार की हुई थी जो चुनावी काल में बाला साहेब की अनुपस्थिति में जनता को सम्बोधित करते थे।

जिनमें सूर्यकांत महाडिक , लीलाधर ढ़ाके , साबिर शेख , मनोहर जोशी , मधुकर सरपोतदार , प्रमोद नवलकर जैसे अनगिनत लोग हुआ करते थे।

मगर अब सिवाय संजय राऊत के कोई नज़र नहीं आता है। स्वर्गीय बाला साहेब को पता था कि जब तक बाहर से नेता नहीं लिए जाएंगे , कोई भी राष्ट्रिय दल आगे नहीं बढ़ सकता है।

कांग्रेस , बसपा , सपा , लालू का जनतादल , जयललिता की राजनीतिक पार्टी इसका उदाहरण हैं। इनकी मौजूदा हालत की वजह ही यही है कि इन दलों ने राजनीतिक दल को निजी जायदाद समझ कर चलाया और अब खत्म होने की कगार पर हैं।

बात फिर करें एकनाथ शिंदे की बगावत पर तो उन्होंने शिवसेना बालासाहेब बनाने का शिगूफा छोड़ा है। राजनीती में खुद को बड़ा खिलाड़ी समझने वाले एकनाथ शिंदे स्वर्गीय आनंद दिघे के शिष्य हैं ,

उन्हें पता होना चाहिए कि हिन्दुस्तान में किसी भी राजनीतिक दल की बी टीम कभी सफल नहीं हुई।

इंदिरा कांग्रेस को आखिर अखिल भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में आना पड़ा , तिवारी कांग्रेस का क्या हुआ ? जनता दल के विभिन्न टुकड़ों का क्या हाल है , राष्ट्रवासी कांग्रेस पार्टी की क्या दुर्दशा है।

और तो और दिघे साहेब के निधन के बाद भी उनके नाम का सहारा लेकर एक राजनीतिक दल बना था। बाद में वह भी विलुप्त हो गया।

कुल मिलाकर मौजूदा वक़्त में एक बात की चिंता होना लाजिमी है कि बागी विधायक जब महाराष्ट्र में लौटेंगे तब जो आपसी संघर्ष होगा और दोनों के समर्थकों में जो जंग होगी। उस पर नियंत्रण के लिए राज्य के गृह मंत्रालय ने क्या योजना बनाई है ?

क्योंकि उद्धव ठाकरे के समर्थकों ने बागी विधायकों के पोस्टर्स पर कालिख पोतने का काम शुरू कर दिया है जो कि बड़े संघर्ष का संकेत है।

इस संघर्ष को टालना ही महाराष्ट्र के हित में होगा। क्योंकि दोनों तरफ से दुखी तो बालासाहेब की आत्मा ही होगी।

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