(कर्ण हिन्दुस्तानी )
उन्नीस तारीख को लोकसभा चुनावों का आखिरी चरण पूर्ण हो जाएगा और उसके बाद २३ मई को मतगणना के बाद देश में नई सरकार का गठन होने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। इन लोकसभा चुनावों के आखिरी दौर में जो पश्चिम बंगाल में हुआ वह किसी भी तरह से लोकतंत्र का चेहरा नहीं है। कई राज्यों में बंटे हिन्दुस्तान की एकता की तो हम बात करते हैं मगर एकता सिर्फ दिखावे के लिए ही है।
ममता बनर्जी की दादागिरी इतनी बढ़ चुकी है कि अब वह सत्ताधारी दल के राष्ट्रिय अध्यक्ष के सामने ही गुंडागर्दी पर उतारू हो गयीं हैं। या तो इसकी वजह यह है कि ममता को अपनी पराजय दिखने लगी है या फिर तृणमूल कांग्रेस चाहती है कि पश्चिम बंगाल में इतनी दहशत फैला दी जाए कि कोई अन्य राजनीतिक दल अपने पैर फैलाने से पहले दस बार विचार करे। राज्यों की राजनीती अब अपनी गिरती साख की वजह से पहचानी जाने लगी है। ना तो मायावती चुनाव लड़ रहीं है , ना ममता चुनाव लड़ रही है और ना ही महाराष्ट्र में मनसे चुनाव लड़ रही है मगर सभी ने मोदी विरोध की धुन को आत्मसात किया हुआ है।
इसकी वजह स्पष्ट है कि मोदी ने जनता को जगाने का काम किया है। मोदी ने सबका साथ – सबका विकास की बात की है। कांग्रेस की तरह सच्चर कमिटी की सिफारशें लागू नहीं की। जिसमें कहा गया था कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है। प्रधानमंत्री आवास योजना का हक़ जितना अन्य नागरिकों को मिला है उतना ही मुसलमानों को भी मिला है। मुख्य और गंभीरता से विचार करने वाली बात यह है कि क्षेत्रीय दलों की वजह से अब तक देश में खिचड़ी सरकारें बनतीं आईं थीं।
इन दलों के नेताओं की हालत यह है कि जिस दल का एक विधायक भी होता है वह प्रदेश का मुख्यमंत्री बन जाता है। दरअसल क्षेत्रीय दलों को लोकसभा चुनाव लड़ने की इज़ाज़त ही नहीं देनी चाहिए। राष्ट्रिय दल के मापदंडों में शामिल होने वाले दलों को ही लोकसभा चुनाव लड़ने देना चाहिए। तभी इस तरह की सियासत पर अंकुश लग सकेगा। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार सहित पश्चिम बंगाल और झारखंड को ही देख लें। उत्तर प्रदेश में जिस मायावती का एक भी संसद नहीं है और खुद मायावती लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहीं हैं वह प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब देख रहीं हैं ,
सपा प्रमुख अखिलेश यादव की हालत क्या होगी कोई नहीं जानता मगर वह अभी से तय कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री कौन होगा। बिहार में लालू प्रसाद अपनी करनी का फल भुगतते हुए सलाखों के पीछे बुढ़ापा काट रहे हैं मगर उनकी औलादें प्रधानमंत्री तय करने में लगीं हैं। झारखंड में शिबू का कभी दबदबा था आज खत्म हो गया है। मगर उनको भी चर्चा में बने रहने का शौंक है। पश्चिम बंगाल में ममता को सत्ता का पिछला दरवाज़ा खुला दिखने लगा है। यानी की राज्य सभा से वह भी दिल्ली की राजनीती करना छह रही है , इसके लिए ममता खून खराबे से भी परहेज़ नहीं कर रहीं हैं। क्या यही है लोकतंत्र के पर्व को मनाने का तरीका ? यदि हाँ , तो मान लीजिये लोकतंत्र चिरायु नहीं रहेगा।