(कर्ण हिन्दुस्तानी )
अब से कुछ माह पहले देश के मीडिया में मी टू का ऐसा चलन चला कि कई पुरुष बदनाम हो गए , हाई प्रोफाइल चेहरों को भी बदनामी का दंश झेलना पड़ा , तहलका के माध्यम से पत्रकारिता को एक नई दिशा देने वाले तरुण तेजपाल हों या फिर छोटे परदे पर संस्कारी बाबू जी के नाम से प्रसिद्द चरित्र कलाकार आलोकनाथ हों सभी को मी टू ने अच्छा खासा बदनाम किया।
सालों बाद कोई महिला उठती है और किसी पुरुष के खिलाफ पुलिस स्ततिओ में जाकर शिकायत करती है कि आज से बीस साल पहले इस पुरुष ने उसके साथ छेड़खानी की थी या फिर उसकी मर्ज़ी के खिलाफ उससे शारीरिक संबंध बनाए थे। पुलिस भी बिना को तफ्दीश किये सामने वाले को पुलिस स्टेशन बुला लेती है और हो जाता है हंगामा , मीडिया भी खबर को हाथों हाथ ले लेता है क्योंकि खबर नामी गिरामी हस्ती के खिलाफ है।
इस खबर में पुरुष का नाम तो उछाल दिया जाता है मगर शिकायतकर्ता स्त्री का नाम गुप्त रखा जाता है। क्या पुरुषों की इज़्ज़त – इज़्ज़त नहीं है। अभी कुछ दिन पहले ही छोटे परदे के नामचीन कलाकार करण ओबेरॉय के खिलाफ एक फैशन डिज़ाइनर ने शारीरिक शोषण का आरोप लगाया और करण को हवालात की हवा खानी पड़ी। इस मामले में पुलिस ने कोई तहकीकात नहीं की।
इससे खफा होकर कुछ फिल्म कलाकारों ने मुंबई में एक पत्रकार परिषद का आयोजन कर करण ओबेरॉय को पूरी तरह से निर्दोष बताया। अभिनेत्री पूजा बेदी ने तो पुरुषों पर स्त्रियों द्वारा किये जाने वाले झूठे मामलों के बारे में आवाज़ उठाने तक कि बात की।
अब सवाल यह उठता है कि क्या पुरुष इस देश के नागरिक नहीं हैं। किसी भी व्यक्ति से निजी बदला लेने के लिए किसी भी स्त्री को आगे कर देना किस हद तक सही है। देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पर भी आरोप लगाया गया और जब यह सभी आरोप गलत साबित हुए तो शिकायतकर्ता महिला ने विधवा विलाप शुरू कर दिया कि उसे न्याय नहीं मिला।
यानी कि शिकायतकर्ता की मंशा यही है कि उसने शिकायत की और फैसला भी उसी के पक्ष में आना चाहिए। यदि जांच में कोई तथ्य ना मिले तो भी शिकायतकर्ता महिला है इस वजह से निर्दोष को सूली पर चढ़ा दिया जाए। सही मायने में अब पुरुषों के हक़ में भी महिला हक़ आयोग की तरह आयोग बनाना समय की मांग बनता जा रहा है। क्योंकि कुछ महिलाओं ने अपने महिला होने का गलत इस्तेमाल शुरू कर दिया है।
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